क्या समय पर आवाज उठाना जरूरी नहीं?

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एके गांगुली पर एक महिला इंटर्न के साथ लगे छेड़खानी के आरोप के मामले में सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी गई है. मेरी नजर में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच एक संस्था की तौर पर की है, सर्वोच्च न्यायालय के तौर पर नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अखबार की रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लेते हुए हमने मामले की जांच की, लेकिन पाया कि घटना उस वक्त घटी, जब जस्टिस गांगुली रिटायर हो चुके थे और इंटर्न भी सुप्रीम कोर्ट से किसी भी प्रकार से जुड़ी हुई नहीं थी. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस मामले में उसे कोई कार्रवाई नहीं करनी है. सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने कहा है कि पहली नजर में ‘पीड़ित का बयान’ इस बात को उजागर करता है कि जस्टिस गांगुली ने पीड़िता के साथ गलत बर्ताव किया. गौर करने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने ‘पीड़िता के बयान’ के आधार पर यह कहा है. उपलब्ध आंशिक रिपोर्ट के मुताबिक अपनी जांच या पीड़ित या आरोपी के बयानों की तुलना को कमेटी ने आधार नहीं बनाया है और न ही बकौल तीसरा पक्ष केस पर कुछ कहा है. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस मामले में दिल्ली पुलिस को कोई निर्देश नहीं दिए और न ही पुलिस को कमेटी की रिपोर्ट भेजी. ऐसे में अब दिल्ली पुलिस गोवा पुलिस की तरह क्या जस्टिस गांगुली के खिलाफ एफआईआर दर्ज करेगी? यह बड़ा सवाल है. लेकिन इससे भी बड़ा सवाल है कि हम पढ़े-लिखे लोग क्या सामने आने में घबराते हैं?  

 

हाल फिलहाल में तीन घटनाओं ने लोगों को झकझोर कर रख दिया. पहला मामला आसाराम का था, जिसमें एक कम पढ़ी लिखी, नाबालिग और गरीब लड़की ने परेशानियों के बावजूद आसाराम के खिलाफ केस दर्ज करवाया. उस लड़की ने दिल्ली में आकर जीरो एफआईआर दर्ज करवाई, जबकि उसकी एफआईआर अन्य जगहों पर नहीं ली गई. उस लड़की के ऊपर काफी दबाव रहा होगा. आसाराम अपने आप में सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि समर्थकों की सेना भी उनके साथ थी. ऊपर से लड़की साधाराण पृष्ठभूमि से आती थी. लड़की के साथ जब कथित तौर पर गलत हुआ, तब वो सामने आई और अपने मां-बाप को यह बात बताई. मां-बाप ने भी उसका साथ दिया और बात एफआईआर तक पहुंची. उस मामले में ‘स्वतः संज्ञान एफआईआर’ शायद नहीं होता, अगर वह लड़की हिम्मत नहीं करती.

 

आसाराम वाले मामले के बाद दो मामले हमारे सामने आए. पहला मामला तहलका के एडिटर तरुण तेजपाल पर लगे आरोपों का था. तरुण तेजपाल पर बलात्कार का केस दर्ज हुआ है और तेजपाल फिलहाल गोवा पुलिस की कस्टडी में है. इस मामले में पीड़िता खुद एक पत्रकार थी और उन्होंने इस घटना की शिकायत अपने मैगजीन में तो की, लेकिन पुलिस के पास नहीं गई. बाद में जब उनका मेल बाहर आया और खबर मीडिया में आई, तब गोवा पुलिस ने खुद एफआईआर दर्ज की और फिर पीड़िता का बयान मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराया गया. यह संज्ञेय अपराध था, लिहाजा पुलिस का कदम सही था. लेकिन एक सवाल यह उठा कि पीड़िता ने पढ़े-लिखे व खुद पत्रकार रहते हुए भी सीधा रास्ता क्यों नहीं अख्तियार किया और सीधे पुलिस में एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराई?

 

ऐसा ही एक और मामला सामने आया, जब टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक ब्लॉग पर लिखी बात को बतौर खबर छापा. इस खबर के छपते ही सनसनी मच गई. ब्लॉग में एक महिला वकील ने आरोप लगाया था कि सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज ने उनके साथ गलत बर्ताव किया और यौन शोषण की कोशिश की. इस मामले में पीड़िता ने कोई शिकायत नहीं की और न ही कोई एफआईआर की, वो भी तब, जबकि वे खुद एक वकील हैं. इस खबर को पढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी गठित की और इसकी जांच शुरू की. इसके अलावा एटॉर्नी जनरल ने भी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के सामने उठाया था. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने अपनी रिपोर्ट चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को सौंपी और वो अब सार्वजनिक कर दी गई है. यह जांच एक संस्था की तरह की गई और पाया कि पीड़िता या आरोपी कोई भी घटना के वक्त संस्था से जुड़ा नहीं था, लिहाजा कार्रवाई की कोई जरूरत नहीं थी. बहरहाल इस मामले में दिल्ली पुलिस कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है. संज्ञेय अपराध है और वो चाहे तो एफआईआर दर्ज कर सकती है.  

 

इन तीनों मामलों को देखने के बाद यह कहना जरूरी समझता हूं कि पीड़िता के ऊपर तमाम दबाव के होने के बावजूद उन्हें समय पर सामने आना चाहिए था, जैसा कि आसाराम के मामले में हुआ. ऐसे में न केवल पुलिस को साक्ष्य जुटाने में सहूलियत होती, बल्कि अगर आरोपों को सही माना जाए, तो अन्य महिलाओं को भी ऐसे लोगों का शिकार होने से रोका जा सकता है. बहरहाल यह कोर्ट तय करेगा कि इन तीनों मामलों में आरोप साबित होते हैं या नहीं. तरुण तेजपाल और जस्टिस गांगुली के मामले बिल्कुल नए हैं, जबकि आसाराम के मामले में कोर्ट ने चार्जशीट पर संज्ञान ले लिया है. इस आलेख को लिखने के पीछे यह कहने का मकसद बिल्कुल नहीं है कि ये आरोप गलत हैं, यह तो कोर्ट को तय करना है, यहां यह कहने का मकसद है कि मामलों को सही समय पर और सही जगह पर उजागर करना भी जरूरी है, ताकि अन्य लोगों को भी ऐसी संभावित घटनाओं से बचाया जा सके और पुलिस को जल्द कार्रवाई करने में मदद की जा सके. इसका यह भी मतलब नहीं कि कोई सच उजागर ही न करे.

Follow Me on Twitter: @srameshwaram

Mail me on: srameshwaram@gmail.com

 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s