क्या जनता से किए वादे पूरा करना जरूरी नहीं था?

दिल्ली में विधानसभा चुनाव संपन्न हो गए. नतीजे ऐसे आए कि किसी की सरकार ही नहीं बन पा रही है. पहली बार ऐसा हो रहा है, जब सरकार बनाने के लिए कोई जल्दबाजी नहीं है, बल्कि विपक्ष में बैठने को लेकर होड़ है. सरकार बनाने को लेकर पहले आप-पहले आप की लड़ाई में जनता पर जल्द ही दोबारा चुनाव का बोझ पड़ सकता है.

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव इस बार खास रहा. सत्तारुढ़ कॉंग्रेस और यहां तक कि दिल्ली की तीन बार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित बुरी तरह से हार गईं. वो भी तब, जबकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि शीला ने दिल्ली में विकास किया है और दिल्ली देश के बेहतरीन शहरों में से एक है. कॉंग्रेस की इस बड़ी हार की वजह आश्चर्यजनक तौर पर परंपरागत विरोधी दल बीजेपी नहीं, बल्कि नई नवेली पार्टी आम आदमी पार्टी यानि आप रही. अपने गठन से महज एक साल बाद आप ने यह चुनाव लड़ा और बड़ा उलटफेर करते हुए 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में 28 सीटें हासिल की. बीजेपी ने 32 सीटें हासिल की, जबकि सत्तारुढ़ कॉंग्रेस सरकार महज 8 सीटों तक सिमटकर रह गई.

 

दिल्ली की जनता ने किसी भी दल को बहुमत नहीं दिया. ऐसे में बीजेपी और आम आदमी पार्टी दोनों ने यह कहकर चौंकाया कि वे सरकार बनाने की कोशिश ही नहीं करेंगे, बल्कि विपक्ष में बैठेंगे. यानि वे दल जिसे जनता ने सत्ता देनी चाही, वे सत्ता से दूर विपक्ष में बैठना चाह रहे हैं. बीजेपी की तो मजबूरी दिख रही है कि वो सबसे बड़ा दल होने के बावजूद भी 36 के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाएगी क्योंकि कॉंग्रेस उसे सपोर्ट करेंगी नहीं और अन्य दो सीटों में से एक पर जेडीयू है, जो बीजेपी को समर्थन नहीं देगी.

 

ऐसे में लगा कि दूसरा विकल्प है ही नहीं क्योंकि आप बहुमत से 8 सीटें दूर है. एक विकल्प खुद आप के नेता प्रशांत भूषण व कभी अरविंद की करीबी रहीं किरण बेदी ने सुझाया कि बीजेपी और आम आदमी पार्टी मिलकर सरकार बना लें. इस विकल्प को बीजेपी और आप ने खारिज कर दिया. दोनों का मिलकर सरकार बनाना व्यवहारिक भी नहीं लग रहा था. दोनों दलों में मतभेद की वजह से सरकार ज्यादा दिनों तक शायद टिक भी नहीं पाती. ऐसे में कॉंग्रेस की तरफ से इस बात का इशारा किया कि वे बीजेपी को तो समर्थन नहीं दे सकते, लेकिन दूसरे सबसे बड़े दल आप को वो बाहर से समर्थन देने के लिए तैयार हैं. कॉंग्रेस के 8 और आप के 28 विधायक मिलकर 36 होते हैं, जो बहुमत का आंकड़ा है. इसके अलावा जेडीयू के विधायक ने भी यह साफ कर दिया कि वे जरूरत पड़ने पर आप को समर्थन दे सकते हैं. इस पर आप की तरफ से ठंडी प्रतिक्रिया आई और आप ने कहा कि हम न तो किसी से समर्थन लेंगे और न देंगे. आप का इन दोनों पार्टियों से राजनीतिक विरोध समझा जा सकता है, लेकिन आप को यह जिम्मेदारी भी समझनी चाहिए थी कि जनता ने उन्हें बहुमत के करीब रखा है और बीजेपी के पास विकल्प नहीं है, लिहाजा उन्हें सरकार बनानी चाहिए. लेकिन आप नैतिकता की दुहाई देकर शायद आगे अपने दम पर सरकार बनाने का सपना देख रहे हैं और इससे भी ज्यादा उनकी निगाहें अब 2014 के आम चुनावों पर है. अगर आप दिल्ली में सरकार बना लेती है, तो उन्हें जनता से किए गए वायदे भी पूरे करने होंगे. आप ने दिल्ली में बिजली बिलों में 50 फीसदी की कटौती का वायदा किया था. इसके अलावा फ्री में 750 लीटर पानी दिए जाने की बात थी. शायद इन दोनों वायदों को पूरा करने में आप को दिक्कतें आतीं. इतना ही नहीं बिना अनुभव के पहली बार सत्ता में रहना भी आप के लिए दिक्कतें पैदा करता. लिहाजा उन्होंने सत्ता से दूर रहना उचित समझा. ऐसे में एक सवाल यह है कि क्या उन्होंने जनता के साथ धोखा नहीं किया? कॉंग्रेस उनके साथ कोई गठबंधन नहीं करने जा रही थी. कॉंग्रेस का समर्थन बाहर से होता. बड़ी बात तो यह थी कि जिसकी वजह से कॉंग्रेस हारी, उसे समर्थन देने तक के लिए राजी हो गई. शायद इसलिए कि दिल्ली को दोबारा चुनाव नहीं देखना पड़े, लेकिन आप ने इसे भी ठुकरा दिया.

 

अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी को चुनौती दी कि 2014 में बीजेपी क्या जोड़तोड़ कर सरकार नहीं बनाएगी? अरविंद शायद यह भूल गए कि करीब दो दशकों से इस देश की जनता ने किसी को भी पूर्ण बहुमत नहीं दिया. तो ऐसे में अगर राजनीतिक दल आपसी सहमति से सरकार न चलाते तो क्या दो दशकों से देश में राष्ट्रपति शासन नहीं लग रहा होता? क्या देश की जनता का पैसा कई बार चुनावों में जाया नहीं हुआ होता? क्या यह लोकतंत्र के साथ गलत नहीं होता? क्या गारंटी है कि दिल्ली में अगली बार आप या किसी और दल को बहुमत मिल ही जाएगा? तो क्या फिर आप इसी प्रकार से किसी से समर्थन नहीं लेगी और नहीं देगी की धुन रटेगी? क्या फिर दिल्ली की जनता का पैसा बर्बाद नहीं होगा? अपने वसूल और महत्वाकांक्षा अच्छी बात है, लेकिन वो जनता के पैसे की कीमत पर न हो. चाहे आप इसे कॉंग्रेस की राजनीति कह लें, पर कॉंग्रेस का आप को समर्थन देने के लिए राजी होना कहीं न कहीं दिल्ली को दोबारा चुनाव से बचाता ही. आप चाहती तो कॉंग्रेस से बाहर से समर्थन लेकर जनता से किए गए वादे पूरी कर पाती. उन्हें वादे पूरे करने से किसने रोका था? तो अब जनता से बड़ी उनकी तथाकथित नैतिकता हो गई?   

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