जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं अरविंद केजरीवाल

दिल्ली में सरकार बनाने को लेकर आम आदमी पार्टी ‘जनमत संग्रह’ करवा रही है. आम आदमी पार्टी का कहना है कि कॉंग्रेस से समर्थन लेने का मन नहीं है, लेकिन कुछ लोग कह रहे हैं कि समर्थन लेना चाहिए, ऐसे में हम ‘जनमत संग्रह’ के बाद तय करेंगे कि हम सरकार बनाएंगे या नहीं. आम आदमी पार्टी ने ‘जनमत संग्रह’ के लिए एसएमएस व सोशल वेबसाइट्स की मदद ली है. सवाल ‘जनमत संग्रह’ के इस तरीके पर भी उठ रहे हैं और सवाल यह भी है कि आखिर लोकतंत्र में जब जनता ने अपने प्रतिनिधि चुन लिए, तो क्या हर फैसले के लिए बार बार जनता के बीच जाना संभव है, या प्रतिनिधियों को खुद फैसला करना होगा. सवाल यह भी है कि क्या अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से जो वादे किए क्या उनको पूरे करने की स्थिति में ही नहीं हैं और सरकार बनाने से डर रहे हैं?

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव इस बार राजनीति और लोकतंत्र की प्रयोगशाला साबित हुई. तीन बार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित एक साल पुरानी पार्टी के नेता के हाथों पराजित हो गईं. जनता से इस एक साल पुरानी पार्टी आम आदमी पार्टी ने बड़े वादे किए. जनता से कहा कि बिजली की दरें आधी कर दी जाएंगी और बड़ी मात्रा में पानी की मुफ्त आपूर्ति होगी. जनता ने आम आदमी पार्टी के पक्ष में मत किया, लेकिन बहुमत नहीं दिया. आम आदमी पार्टी को 28 सीटें मिलीं और बीजेपी 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन गई. ऐसे में लगा कि अब सरकार नहीं बन पाएगी. लेकिन कॉंग्रेस ने बड़ा स्टैंड लेते हुए आम आदमी पार्टी को समर्थन का एलान कर दिया. कॉंग्रेस के समर्थन के जवाब में आम आदमी पार्टी ने शर्तेों की लिस्ट थमा दी. इन 18 शर्तों में से दो को छोड़कर बाकी मामलों में किसी पार्टी के समर्थन की जरूरत नहीं थी और सरकार खुद फैसले कर सकती थी. जबकि बाकी दो पर भी कॉंग्रेस राजी हो गई. फिर लगा कि अब तो दिल्ली में सरकार बन गई समझो. इसके बावजूद अभी तक सरकार नहीं और आम आदमी पार्टी ने संभवतः जिम्मेदारी टालने के लिए जनता के बीच जाने का फैसला किया. इसमें अब दिल्ली की जनता आम आदमी पार्टी द्वारा दिए गए फोन नंबरों पर कॉल करके और एसएमएस करके अपनी राय दे रही है. दावा है कि पिछले 24 घंटों में 4 लाख एसएमएस आ गए हैं. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या आम आदमी पार्टी का यह तरीका सही है? क्या उनके जनप्रतिनिधियों को खुद ये फैसला नहीं करना चाहिए? यह भी तो संभव है कि इस प्रक्रिया में ऐसे लोग भी राय दे रहे हों, जो दिल्ली के वोटर ही न हों या फिर वो 18 साल से कम आयु के हों. यह भी संभव है कि इसमें अन्य प्रांतों के लोग भी राय रख रहो हों. ऐसे में आम आदमी पार्टी के ‘जनमत संग्रह’ का तरीका ही गलत है. अरविंद केजरीवाल कह रहे हैं कि वे सिर्फ जनता का ‘सेंस’ जानना चाहते हैं. इस पर सवाल है कि क्या वे जनता द्वारा चुने गए अपने विधायकों के बीच वोटिंग नहीं करवा सकते थे?

 

अरविंद केजरीवाल के कदमों से लगता है कि वे दिल्ली में सरकार बनाने की जिम्मेदारी ही नहीं लेना चाहते हैं. तभी उन्होंने कल अपने मन की बात कह दी और कहा कि उनकी पार्टी का मन नहीं है कि कॉंग्रेस का समर्थन लिया जाए फिर भी जनता की राय ले रहे हैं. अगर ऐसा है तो क्या यह समझा जाए कि अरविंद सिर्फ एक बेहतर सामाजिक कार्यकर्ता हैं एक बेहतर राजनीतिज्ञ नहीं? अगर ऐसा है तो आखिर अरविंद चुनावी मैदान में सपनों के सौदागर बनकर कूदे क्यों? अगर अरविंद वाकई दिल्ली की जनता का हित करना चाहते हैं तो सरकार बनाकर ऐसा करने से बढ़िया कोई विकल्प हो नहीं सकता है. लेकिन लगता है कि अरविंद केजरीवाल एक बेहतर सामाजिक कार्यकर्ता तो हैं, लेकिन बेहतर राजनीतिज्ञ नहीं. जनता को जो सपने अरविंद केजरीवाल ने दिखाए हैं, उसके बदले जनता ने उन्हें वोट दिया है. अब इन सपनों को पूरा करने का वक्त है, तो फिर केजरीवाल भाग क्यों रहे हैं – यह समझ से परे है.

 

कॉंग्रेस द्वारा आप को दिया गया समर्थन राजनीतिक वजहों से हो सकता है. लेकिन इतना तय है कि कॉंग्रेस दिल्ली की जनता के दिलों में यह भरोसा जगाने में भी संभवतः कामयाब रहेगी कि कॉंग्रेस दोबारा चुनाव नहीं चाहती है और इसके लिए अपनी विरोधी आम आदमी पार्टी तक को समर्थन देने को तैयार हो गई है. वहीं अगर आप सरकार नहीं बनाती है, तो तो जनता यह समझ सकती है कि अरविंद बातें अच्छी करते हैं, पर काम की जिम्मेदारी शायद नहीं लेना चाहते.

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