खुला ख़त उमर के नाम

प्रिय उमर, पता चला कि तुम जेएनयू में ही हो और पुलिस तुम्हें हर जगह ढूंढ रही है। तुम्हारा वीडियो भी देखा। तुम बहुत अच्छा बोलते हो। तुमने कई जायज सवाल भी उठाए हैं। कोई न्यूज़ चैनल तुम्हें दोषी करार नहीं दे सकता, ये हक़ सिर्फ अदालतों को है। किसी को हक़ नहीं कि तुम्हारे पिता या बहनों के लिए अपशब्द लिखे या कहे, डराए या धमकाए। कोई भी सिर्फ तुम्हारे धर्म के नाम पर तुम्हें अच्छा या बुरा सर्टिफिकेट नहीं दे सकता। मैं भी ऐसा ही मानता हूँ पर कुछ सवालों के जवाब तुम्हें भी देने होंगे मेरे भाई। मसलन, तुम आत्मसमर्पण क्यों नहीं करते? तुम उन नकाबपोश लोगों की पहचान करने में पुलिस की मदद क्यों नहीं करते, जो तुम्हारे देश को तोड़ने की बात कह रहे थे? तुमने अपने इस भाषण में दूसरों पर तो सवाल खड़े किए पर देशविरोधी नारों की और ऐसा करने वालों की निंदा एक बार भी क्यों नहीं की? वो कौन थे जिन्हें तुमने परमिशन दिलवाई थी? तुम इतने सालों से जेएनयू में कौन सा कोर्स कर रहे हो? क्या तुम वहां अब सिर्फ राजनीति करने के लिए हो और किसी और विद्यार्थी का हक़ मार रहे हो? इत्यादि। जिस कानून के आधार पर तुम अपने बचाव में भाषण दे रहे हो, उस कानून की इज्ज़त भी तो करो मित्र। अभी भी समय है, अपने अधिकार के साथ साथ अपने कर्तव्य को भी समझो।

शुभकामनाओं के साथ।

तुम्हारा हमवतन,

सिद्धार्थ

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