केजरीवाल जी, ‘आप’ के ‘अघोषित उम्मीदवार’ जरनैल तो नहीं?

दिल्ली के मुख्यमंत्री व आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि अब यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि सिद्धू कांग्रेस में सीएम बनने के लिए ही गए हैं। केजरीवाल ने कहा कि आप ने सिद्धू को डिप्टी सीएम का पद ऑफर किया था और वे इसे ठुकरा कर गए क्योंकि उन्हें सीएम बनना था। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धू को फिलहाल सिर्फ चुप रहने के लिए कहा गया है और वे कांग्रेस के ‘अघोषित उम्मीदवार’ हैं। लेकिन यहाँ एक सवाल ये भी है कि आखिर ‘आप’ के मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर अरविन्द अब तक क्यों चुप हैं? कहीं जरनैल ‘आप’ के ‘अघोषित उम्मीदवार’ तो नहीं?
आने वाले चुनावों में ज्यादातर दलों की सबसे बड़ी परीक्षा उत्तर प्रदेश में होगी, लेकिन अरविन्द केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी की परीक्षा पंजाब में होगी। इसलिए वे फूँक-फूँककर कदम रख रहे हैं। केजरीवाल इस बात को समझते हैं कि अगर ‘आप’ जीती तो उनकी असली अग्नि परीक्षा होगी, लिहाजा मोहरे उसी हिसाब से तय हो रहे हैं।
असल में राजनीतिक व प्रशासनिक दृष्टि से पंजाब के मुख्यमंत्री के आगे दिल्ली जैसे राज्य के मुख्यमंत्री की हैसियत महापौर से ज़्यादा नहीं है। ऐसे में अगर आम आदमी पार्टी पंजाब में चुनाव जीत जाती है तो क्या केजरीवाल किसी और को बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनने देंगे और खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री बने रहेंगे? अगर उन्होंने किसी और को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया व खुद दिल्ली की कुर्सी पर बैठे रहे तो क्या पंजाब दिल्ली की सुनेगा? संभवतः यही वो सवाल हैं जिनकी वजह से पार्टी ने पंजाब में अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार अब तक घोषित नहीं किया है। आम आदमी पार्टी ने गोवा में अपने मुख्यमंत्री प्रत्याशी का नाम सामने रख दिया, लेकिन पंजाब में अब तक चुप है।
पंजाब के उपमुख्यमंत्री व अकाली दल प्रमुख सुखबीर बादल के खिलाफ जलालाबाद सीट से आम आदमी पार्टी ने सांसद भगवंत मान को टिकट दिया गया है। सुखबीर बादल के साले व वर्तमान वित्त मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया के खिलाफ पार्टी ने अपने युवा चेहरे हिम्मत सिंह शेरगिल के नाम का ऐलान किया है। और अब अरविन्द ने वर्तमान मुख्यमंत्री व दिग्गज अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ, उनकी लांबी सीट से, दिल्ली के एक विधायक जरनैल सिंह को उतारने की घोषणा की है। इसका मतलब ये है कि पंजाब चुनाव के लिहाज से आम आदमी पार्टी के सभी बड़े चेहरे सामने आ चुके हैं, फिर भी पार्टी ने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम का ऐलान नहीं किया है।
रणनीति इस हिसाब से तय हो रही है कि अगर वे पंजाब जीत गए तो क्या करेंगे? पहला विकल्प तो ये बनता है कि वे दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दें और मनीष सिसोदिया को मुख्यमंत्री बना दें और खुद पार्टी संभालें। वैसे भी केजरीवाल ने अपने पास कोई विभाग नहीं रखा है। लेकिन ऐसी स्थिति में दिल्ली की जनता नाराज़ हो सकती है, जिसने केजरीवाल के नाम पर आम आदमी पार्टी को न केवल प्रचंड बहुमत दिया, बल्कि जड़ें जमाने के लिए जमीन दी।
दूसरा विकल्प ये हो सकता है कि अरविंद दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दें और पंजाब के मुख्यमंत्री बन जाएं, पर ऐसे में दिल्ली उन्हें फिर से ‘भगौड़ा’ कहेगी। केजरीवाल को उस वक़्त भी विपक्षी दलों ने दिल्ली की जनता से किया उनका वादा याद दिलाया था, जब सितम्बर में अपने पंजाब के चार दिनी दौरे पर उन्होंने बादल सरकार को उखाड़ फेंकने तक पंजाब में तंबू गाड़कर बैठने की बात कही थी। उन्हें याद दिलाया गया था कि 14 फरवरी 2015 को दोबारा दिल्ली का मुख्यमंत्री बनते वक़्त उन्होंने कहा था कि लोकसभा चुनाव से उन्हें सीख मिली है और वे अगले पांच साल तक दिल्ली के लिए काम करने वाले हैं। दूसरी तरफ पंजाब के बहुत से लोग उन्हें ‘बाहरी’ मान सकते हैं क्योंकि अरविन्द मूलतः हरियाणा के हैं और वर्तमान में दिल्ली के सीएम हैं और वैसे भी वर्तमान पंजाब के 5 दशक के इतिहास में अब तक कोई सिख ही मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठा है।
फिलवक्त उनके लिए इन सबसे बेहतर विकल्प यही नज़र आता है कि वे खुद दिल्ली के सीएम बने रहें और अपने किसी भरोसेमंद को पंजाब में सीएम बनने दें। ऐसा मुख्यमंत्री केजरीवाल के साए में रह कर ही काम करना स्वीकार करे या हारने की स्थिति में भी विपक्ष में केजरीवाल की आवाज बनकर बोले। इसके लिए वो कांग्रेस की तरह बड़े राज्यों में दो या ज्यादा पावर सेंटर बनाकर रखने की पुरानी नीति भी अपना सकते हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति उनके कंट्रोल से बाहर न हो।
जाहिर है, आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल के सामने एक बड़ी चुनौती है। पार्टी की शुरुआत से लेकर अब तक उन्हें उनके कई साथी छोड़ कर जा चुके हैं। उनपर आरोप लगता रहा है कि वे पार्टी में अंदरूनी लोकतंत्र नहीं चाहते। खुद पंजाब से उन्हीं की पार्टी के टिकट पर चुनकर संसद पहुंचे चार में से तीन लोग उनके खिलाफ ही बोलते रहे हैं।
फिलहाल तो वर्तमान मुख्यमंत्री के खिलाफ केजरीवाल ने जरनैल पर भरोसा जताया है। जरनैल दिल्ली से विधायक हैं, एक सरदार हैं और 1984 सिख दंगों के पीड़ितों के लिए आवाज़ उठाने के लिए जाने जाते हैं। वैसे, अगर आप की दिल्ली विधानसभा और लोकसभा चुनाव के ट्रेंड को देखें तो जरनैल सीएम उम्मीदवार हो सकते हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल आप के उम्मीदवार थे और तत्कालीन सीएम शीला दीक्षित के खिलाफ लड़े। लोकसभा चुनाव में केजरीवाल ने बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ा। इस हिसाब से पंजाब के वर्तमान मुख्यमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले जरनैल को पार्टी पंजाब में अपना चेहरा बना सकती है। केजरीवाल के लिहाज से ये अच्छी बात है कि जरनैल पंजाब की आतंरिक राजनीति में खास दखल नहीं रखते, लिहाजा वहाँ न उनके दोस्त ज्यादा हैं और न दुश्मन। ऐसे में केजरीवाल उनपर सबसे ज्यादा भरोसा कर सकते हैं। लेकिन यहाँ दिल्ली विधानसभा चुनाव से इतर ये भी संभव है कि ‘आप’ चुनाव नतीजे आने तक उम्मीदवारी पर चुप रहे और जरनैल ‘अघोषित उम्मीदवार’ ही बने रहें। इससे पंजाब इकाई में दिल्ली के इस विधायक जरनैल को लेकर चुनाव से पहले कोई असंतोष भी पैदा नहीं होगा।
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लोगों ने पूछा, दिल्ली मेट्रो में सिर्फ पेटीएम क्यों?

दिल्ली-एनसीआर के 10 मेट्रो स्टेशन 1 जनवरी से ‘कैशलेस’ होने जा रहे हैं। काफी व्यस्त मानी जाने वाली ब्लू एवं येलो लाइन पर स्थित इन 10 स्टेशनों पर आप सिर्फ पेटीएम के जरिए भुगतान कर के ही टोकन ले पाएंगे। मेट्रो को ‘कैशलेस’ बनाने की इस पहल पर सवाल भी उठने लगे हैं। लोग सवाल पूछ रहे हैं, ‘आखिर सिर्फ पेटीएम क्यों?’

हालांकि दिल्ली मेट्रो के मुताबिक शुरूआती दिनों में एक काउंटर पर कैश देकर भी टोकन लिए जा सकेंगे।दिल्ली मेट्रो के मुताबिक उन 10 स्टेशनों को चुना गया है, जहाँ पहले से ही 70 फीसदी यात्री स्मार्ट कार्ड का प्रयोग करते हैं, इसके अलावा इन स्टेशनों पर पहले से लगीं टोकन वेंडिंग मशीनों में डेबिट व क्रेडिट कार्ड से पेमेंट की सुविधा भी धीरे-धीरे दी जाएगी। ये 10 स्टेशन होंगे- रोहिणी ईस्ट, रोहिणी वेस्ट, एमजी रोड, मयूर विहार फेज 1, निर्माण विहार, तिलक नगर, जनकपुरी वेस्ट, नोएडा सेक्टर 15, नेहरू प्लेस और कैलाश कॉलोनी।

दिल्ली मेट्रो ने ‘कैशलेस’ बनाने के लिए मेट्रो नेटवर्क के जिन दो लाइनों के स्टेशनों को चुना है, उन लाइनों पर रोजाना औसतन 20 लाख लोग यात्रा करते हैं। मेट्रो द्वारा सिर्फ एक प्राइवेट ‘ई-वॉलेट’ पेटीएम को कैशलेस पेमेंट के लिए चुनना सवाल खड़े करता है। इसका ये मतलब हुआ कि आपको अगर इन स्टेशनों पर टोकन लेना है तो आपके फोन पर पेटीएम ऐप्प होना जरुरी है। सिर्फ एक कैश काउंटर होगा और वो भी शुरूआती दिनों के लिए। सवाल है कि दिल्ली मेट्रो कोई प्राइवेट कंपनी नहीं है, जो लोगों पर इस तरह की शर्त थोपे। अगर कैशलेस करना ही था, तो अन्य ‘ई-वालेट्स’ की इजाजत क्यों नहीं दी गई? कई ‘ई-वॉलेट’ तो सरकारी बैंक भी मुहैया करा रहे हैं, फिर उनको भी शामिल क्यों नहीं किया गया? पहले भी पेटीएम के उस विज्ञापन को लेकर विरोधी दलों ने सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना साधा था, जिसमें प्रधानमंत्री की तस्वीर इस्तेमाल की गई थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी पहले भी केंद्र सरकार पर नोटबंदी के नाम पर पेटीएम को फायदा पहुंचाने का आरोप लगा चुके हैं। ऐसे में क्या दिल्ली मेट्रो का ये फैसला विपक्ष के तरकश में और तीर नहीं डाल रहा? जाहिर है ये दिल्ली मेट्रो का फैसला है और इससे पीएमओ का कोई लेना-देना नहीं होगा, पर यह फैसला कहीं न कहीं फिर से प्रधानमंत्री मोदी को विपक्ष के निशाने पर ला खड़ा करेगा। बेहतर होगा कि दिल्ली मेट्रो ‘कैशलेस’ के इस अभियान में अन्य प्लेटफार्म का भी इस्तेमाल करेगी। लोगों ने इस कदम का विरोध भी शुरू कर दिया है।

 

इतने यू-टर्न क्यों सरकार?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर को जैसे ही नोटबंदी की घोषणा की, उसके कुछ देर बाद ही पीएमओ की तरफ से एक ट्वीट किया गया, जिसमें साफ़ लिखा था कि लोग 500 व 1000 रुपए के पुराने नोटों को 10 नवंबर से लेकर 30 दिसंबर तक पोस्ट ऑफिस या बैंक में अपने खाते में जमा करा पाएंगे। इसके कुछ दिनों बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कहा कि लोगों को हड़बड़ाने की जरुरत नहीं है और उनके पास 30 दिसंबर तक का वक़्त है।

जाहिर है, कुछ लोगों ने बैंकों में शुरूआती भीड़ को देखते हुए व अपने प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की बात को मानते हुए थोड़ा इंतज़ार करना ठीक समझा। लेकिन, फिर 19 दिसंबर को अचानक आरबीआई का नोटिफिकेशन आया, जिसमें कहा गया कि लोग 5000 रुपये से ज्यादा के 500 व 1000 के पुराने नोट अब बैंक में सिर्फ एक बार जमा करा पाएंगे और उसपर भी बैंक के दो अधिकारी उनसे पूछताछ करेंगे। इस पर सोशल मीडिया पर हंगामा मचने के बाद खुद वित्त मंत्री सामने आए और कहा कि एक बार जमा कराने पर कोई पूछताछ नहीं होगी, लेकिन 20 दिसंबर की शाम होते-होते खबरें आने लगीं कि लोगों को बैंकों में भारी दिक्कत हो रही है और बैंककर्मी कोई रिस्क नहीं लेना चाहते, लिहाजा नोटिफिकेशन के आधार पर लोगों से पूछताछ करने के बाद ही 5000 रुपये से ज्यादा के पुराने 500 और 1000 के नोट लिए जा रहे हैं। नोटबंदी को लेकर सरकार पर निशाना साध रही विपक्षी पार्टियों को एक और मौका मिला। यूपी में एक चुनावी रैली में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर हमला बोला। उन्होंने कहा, ‘आरबीआई उसी प्रकार नियम बदल रही है, जिस प्रकार प्रधानमंत्री कपड़े बदलते हैं।’ वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक ने अपने ब्लॉग में लिखा, ‘नोटबंदी के चक्र-व्यूह में फंसी सरकार को गजब का मतिभ्रम हो रहा है। पिछले 40-42 दिन में वह नोटबंदी संबंधी लगभग 100 फरमान जारी कर चुकी है। कुछ उसने, कुछ रिजर्व बैंक ने और कुछ प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने। मरता, क्या न करता? उसे जो भी दवा बताई जाती है, उसे ही वह तुरंत गुड़कने लगती है। दस्त बंद करने की दवा से उसे कब्जी हो जाती है और कब्ज ठीक करने की दवा से उसे दस्त लग जाते हैं।’ वैदिक ने आगे लिखा, ‘यह ठीक है कि सरकार काले धन के सफेदीकरण से घबरा गई है और उसे दहशत बैठ गई है कि उसके अंदाज से कहीं सवाया-डेढ़ा या दुगुना पैसा बैंकों में जमा न हो जाए। अब देखते हैं कि 30 दिसंबर तक सरकार कौनसा नया पैंतरा मारती है?’

दरअसल ये शायद पहला मौका होगा जब लोग सरकार की कही बातों पर यकीन नहीं कर पा रहे। रिज़र्व बैंक और वित्त मंत्रालय बीते 43 दिनों में 60 बार नोटबंदी पर नियम बदल चुका है। सरकार कल कुछ कहती है और आज कुछ। नोटबंदी के बाद लगातार बदले जा रहे नियमों के बीच एक बार फिर आरबीआई ने आज फिर एक नया नोटिफिकेशन जारी किया है। आरबीआई ने सफाई दी है कि 5000 रुपये से ज्यादा के नोट जमा कराते वक्त लोगों से अब बैंक अधिकारी कोई सवाल जवाब नहीं करेंगे। केवाईसी खातों पर एकमुश्त जमा वाला नियम लागू नहीं होगा। सरकार के इन्हीं यू-टर्न पर कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं, ‘आरबीआई का मतलब आजकल रिवर्स बैंक ऑफ़ इंडिया हो गया है।’ उनका दावा है कि इन 43 दिनों में आरबीआई और वित्त मंत्रालय ने 126 बार नियम बदले हैं। यहाँ तक कि बीजेपी की सहयोगी पार्टियां भी अब नोटबंदी को लेकर हो रही परेशानियों की वजह से इसकी आलोचना करने लगी हैं, ताज़ा नाम तेलुगू देशम पार्टी का है। लेकिन, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह चंडीगढ़ में हुए स्थानीय निकाय के चुनाव परिणामों का उदाहरण देकर कहते हैं कि जनता उनके फैसलों के साथ है।

एडमिन हैं? तो ये राहत की खबर है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक ताजा आदेश में कहा कि व्हाट्सएप्प और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर होने वाली चैटिंग के दौरान ग्रुप के किसी सदस्य द्वारा पोस्ट की जाने वाली किसी आपत्तिजनक सामग्री के लिए उस ग्रुप के एडमिन को दोषी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब ऐसे ग्रुप्स में किसी भी प्रकार की सामग्री पोस्ट करने से पहले एडमिन की रजामंदी जरुरी नहीं होती है, तो किस प्रकार एडमिन को दोषी माना जाए। दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज की बेंच ने अवमानना के एक मामले को ख़ारिज करते हुए ऐसा कहा। अदालत ने कहा कि एडमिन, ग्रुप के सदस्यों से सिर्फ आग्रह कर सकता है कि वे ऐसी सामग्री न पोस्ट करें।

इस फैसले से ऐसे तमाम लोगों को राहत मिल सकती है, जिन्हें महज एडमिन होने की वजह से, किसी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर, किसी चैट ग्रुप में किसी सदस्य द्वारा की गई आपत्तिजनक पोस्ट की वजह से परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। देश भर में व्हाट्सएप्प को लेकर ऐसे कई मामले सामने आए, जहाँ किसी चैट ग्रुप के किसी सदस्य के आपत्तिजनक पोस्ट के लिए एडमिन को भी जिम्मेदार मानते हुए उसके खिलाफ भी पुलिस में शिकायत दर्ज हुई और कुछ मामलों में गिरफ़्तारी भी हुई। बीते जून महीने में इंदौर में कथित तौर पर व्हाट्सएप्प ग्रुप के जरिए शहर का माहौल खराब करने की जानकारी मिलने पर पुलिस ने ग्रुप एडमिन पर सख्ती शुरू कर दी और इसी के चलते तीन ग्रुप एडमिन को पुलिस की ओर से नोटिस भेज दिया गया। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में बीते साल एक व्हाट्सएप्प ग्रुप में एक व्यक्ति ने महात्मा गांधी को लेकर एक आपत्तिजनक पोस्ट किया। इसी ग्रुप के एक सदस्य की शिकायत पर उस आरोपी को तो गिरफ्तार किया ही, बल्कि एडमिन को भी गिरफ्तार कर लिया गया। अक्टूबर महीने में आगरा में एक व्हाट्सएप्प ग्रुप के एडमिन को भी इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि उस ग्रुप के एक सदस्य ने प्रधानमंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट कर दिया था। इसके बाद इस बात को लेकर सवाल भी खड़े हुए थे कि किसी मेंबर की पोस्ट के लिए एडमिन किस प्रकार जिम्मेदार हो सकता है। हालाँकि ये भी कहा गया कि एडमिन किसी सदस्य की किसी आपत्तिजनक पोस्ट के लिए दोषी नहीं हो सकता, लेकिन ये उस ग्रुप के एडमिन व अन्य सदस्यों का कर्तव्य बनता था कि वे कानून-व्यवस्था बिगाड़ने वाले या किसी आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले किसी सदस्य के पोस्ट की शिकायत करे और एडमिन वैसे मेंबर को तुरंत उस ग्रुप से हटाए।

व्हाट्सएप्प को हमारे देश में करोड़ों लोग प्रयोग में लाते हैं और आज यह सोशल मीडिया का यह सबसे लोकप्रिय प्लेटफॉर्म बन चुका है। एक व्यक्ति अपने मोबाइल फोन के जरिए कई व्हाट्सएप्प ग्रुप से जुड़ा होता है या फिर उसका एडमिन होता है। इसके बावजूद हमारे देश में सोशल मीडिया या सोशल मैसेजिंग ऐप्स के लिए अलग से कोई कानून नहीं है। इन मामलों में आईटी एक्ट के तहत ही कार्रवाई की जाती है। जरूरत पड़ने पर आईपीसी की धाराओं में भी केस दर्ज किया जाता है।

ख़बरों में क्यों छाया ‘तैमूर’?

सैफ अली खान और करीना कपूर के नवजात बेटे का नाम तैमूर अली खान पटौदी रखा गया है। करीना और सैफ के बेटे का नाम करन जौहर दुनिया के सामने लाए। उन्होंने करीना को बधाई देते हुए ट्वीट किया। जानकारी सामने आते ही छोटे पटौदी यानी तैमूर अली खान पटौदी ख़बरों में छा गए। इसमें सबसे ज्यादा चर्चा उनके नाम को लेकर हो रही है। वैसे तो तैमूर का अर्थ लोहा होता है, लेकिन तैमूर नाम तैमूर लंग की वजह से ज्यादा जाना जाता है। यही वजह है कि करन जौहर के ट्वीट के बाद लोग सैफीना को बधाई तो दे रहे हैं, लेकिन नाम पर सवाल भी खड़े कर रहे हैं। यह उनकी निजी जिंदगी से जुड़ा फैसला है, लेकिन सेलिब्रिटी होने के नाते सैफ और करीना को, सोशल मीडिया पर, अपने ही फैन्स के सवालों से दो-चार होना पड़ रहा है।
कौन था तैमूर लंग?
तैमूर लंग अपनी वीरता से ज्यादा अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात है। समरकंद का शासक तैमूर लंग दूसरा चंगेज खाँ बनना चाहता था। वह लंगड़ा था, इसलिए तैमूर लंग ( लंगड़ा) कहलाता था। हालाँकि अपनी अपंगता को उसने अपनी महत्वाकांक्षा के आड़े कभी नहीं आने दिया।  वह बहुत बड़ा तलवार बाज और अव्वल दर्जे का योद्धा था। वह जहाँ-जहाँ पहुँचा वहां उसने भारी तबाही और नरसंहार मचाया। कहा जाता है कि एक जगह उसने दो हजार जिंदा आदमियों की एक मीनार बनवाई और उन्हें ईंट और गारे में चुनवा दिया।  उसकी विजय यात्रा के साथ ही उसकी क्रूरता की कहानी शुरू हो गई थी और बेशक उसका एक अध्याय भारत भी था। भारत पर तैमूर ने 1399 ई. में आक्रमण किया। अपनी जीवनी तुजुके तैमुरी में उसने भारत पर अपने आक्रमण का कारण बताते हुए लिखा, ‘हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने का मेरा ध्येय काफिरों के विरुद्ध धार्मिक युद्ध करना है।’ इससे ये साबित होता है कि वो एक कट्टर मुसलमान था। हालांकि कुछ इतिहासकार ये भी कहते हैं कि ‘काफिरों’ का विध्वंस तो आक्रमण का बहाना मात्र था। वस्तुत: वह भारत के स्वर्ण से आकृष्ट हुआ। भारत की महान्‌ समृद्धि और वैभव के बारे में उसने बहुत कुछ बातें सुन रखी थीं। कहा जाता है कि भारत पर आक्रमण के दौरान कश्मीर में उसने महज कुछ घंटों में दस हज़ार लोगों के सर कलम करवा डाले। तैमूर कश्मीर के बाद अब के पंजाब और हरियाणा के बड़े हिस्से में कत्लेआम मचाता हुआ दिल्ली की ओर बढ़ चला। दिल्ली पर जीत हासिल करने से पहले उसने करीब 1 लाख युद्ध बंदियों को मौत के घाट उतार दिया। दिल्ली पर उसकी चढ़ाई रोकने के लिए तुगलक बादशाह सुल्तान महमूद ने उससे दो-दो हाथ किए, पर सुल्तान को हराकर तैमूर ने दिल्ली में प्रवेश कर लिया, जबकि सुल्तान मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ। इतिहासकारों की मानें तो दिल्ली में वह 15 दिनों तक रहा और उसने पूरे शहर को कसाईखाना बना दिया। इसके बाद वह समरकंद वापस लौट गया था। दिल्ली की दौलत तैमूर लूटकर समरकंद ले गया। अनेक बंदी बनाई गई औरतों और शिल्पियों को भी तैमूर अपने साथ ले गया। भारत से जो कारीगर वह अपने साथ ले गया उनसे उसने समरकंद में अनेक इमारतें बनवाईं। हालांकि, 18वीं शताब्दी के इतिहासकार एडवर्ड गिब्बन ने तैमूरलंग की तारीफ करते हुए लिखा कि तैमूरलंग की बहादुरी व जंग की काबलियत को कभी स्वीकार नहीं किया गया। तैमूर ने जिन-जिन देशों पर जीत हासिल की। वहां के शासकों ने उसके बारे में हमेशा झूठी कहानिया प्रचारित करवाईं। गिब्बन के अनुसार, तैमूर की मौत 1405 में उस समय हुई, जब वह चीन के राजा मिंग के खिलाफ युद्ध लड़ने जा रहा था। इस दौरान बीच रास्ते में ही बीमारी के चलते उसकी मौत हो गई। अपाहिज होने के बावजूद तैमूर अपनी आखिरी सांस तक किसी से नहीं हारा।

पेटीएम हुआ डाउन, फूटा लोगों का गुस्सा

नोटबंदी के बाद लोगों को आ रही दिक्कत उस वक़्त और बढ़ गई जब गुरुवार देर शाम ई-वॉलेट पेटीएम ने अचानक कुछ देर के लिए काम करना बंद कर दिया। पेटीएम की तरफ से ट्वीट कर के रात के 8 बजकर 17 मिनट पर ये कहा गया कि, ‘आप लोगों में से कुछ थोड़ी देर के लिए परेशानी हो रही होगी। हम क्षमता बढ़ाने के लिए अपने सिस्टम को अपडेट कर रहे हैं। थोड़ी देर में सब ठीक होगा।’

@paytm

Some of you might be facing temporary inconvenience on our platform. We’re currently updati ng our systems for higher capacity. Back shortly.

नोटबंदी के बाद नकदी की समस्या से जूझ रहे लोगों को थोड़ी देर में ही भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लोगों ने पेटीएम को ट्वीट कर के अपनी नाराजगी जाहिर की। अमी सान्याल नाम के व्यक्ति ने लिखा, ‘पेटीएम, मैं अपने कैब के लिए पैसे नहीं दे पा रहा हूँ। मेरे पास कैश नहीं है। आपका सिस्टम कब वापस ऑनलाइन होगा?’

@switchshot

@Paytm I am not being able to pay for my cab because of the outage. Have no cash. When will your system be back online?! @Paytmcare

अमित मूर्ति ने लिखा कि, ‘लगता है ये झूठ है, अपग्रेड सामान्यतः रात के वक़्त किया जाता है।,

@amitmurthy

@Paytm @sourabhs almost definitely a lie. Upgrades would usually be done late at night during minimal load.

राहुल अग्रवाल नाम के एक पेटीएम यूजर ने ट्वीटर पर लिखा की, ‘मैं अस्पताल में अपना बिल नहीं चुका पा रहा, मेरे पास कैश नहीं है।’

@rahulaggarwalg

@Paytm I am not being able to pay for my hospital bill because of the outage. Have no cash. When will your system be back online?!

ब्लॉग लिखे जाने तक ट्वीटर पर लोग अपनी परेशानियां बता रहे थे, हालांकि पेटीएम ने रात 9.48 बजे ट्वीट करके लोगों को बताया कि अब सबकुछ सामान्य है।  पेटीएम भारत में प्रयोग में लाया जाने वाला सबसे बड़ा ई-वॉलेट है। 9 नवंबर से हुई नोटबंदी के बाद से इसका इस्तेमाल और बढ़ा है। इससे पहले कई जगहों पर विभिन्न बैंकों के क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड से पेमेंट में दिक्कतों की ख़बरें आ चुकी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या देश कैशलेस इकॉनमी के लिए वाकई तैयार है।

संसद के स्वास्थ्य की चिंता किसे है आडवाणी जी?

‘कभी-कभी कार्यवाही नहीं चलने से भी परिणाम निकलते हैं।’ 13 दिसम्बर 2010 की सुबह, संसद भवन परिसर में, 2001 में संसद पर हुए आतंकी हमले में शहीद सुरक्षाकर्मियों को श्रद्धांजलि देने के बाद आडवाणी ने संवाददाताओं से बातचीत के दौरान यह बात कही थी। तब भी संसद का शीतकालीन सत्र पूरी तरह से धुल गया था और सोनिया गांधी ने इसके लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया था। इसी आरोप के जवाब में आडवाणी ने ये बात कही। दरअसल, तब विपक्ष चाहता था कि तत्कालीन यूपीए सरकार 2जी घोटाले की जांच के लिए जेपीसी का गठन करे, जबकि सरकार इसके लिए राजी नहीं थी। आडवाणी ने संसद सत्र के ख़त्म होने के बाद एनडीए की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 14 दिसम्बर को फिर कहा, ‘मैं 1970 से सांसद हूँ, बीच में सिर्फ 2 साल छोड़ के, मुझे स्मरण नहीं कि इस प्रकार का कोई अधिवेशन पहले कभी हुआ हो, जब पूरे सत्र ही कार्यवाही न चली हो। लोकसभा में पहले दिन कार्यवाही चली, लेकिन जब भ्रस्टाचार के मामले पर सुषमा स्वराज को कांग्रेसी सांसदों ने बोलने नहीं दिया, तब एनडीए ने ये तय कर लिया कि हम सभी विषयों पर चर्चा तो चाहते हैं, पर अब अन्य विषयों पर अब चर्चा तभी होगी, जब सरकार जेपीसी की हमारी मांग मान लेगी।’

ख़बरों के मुताबिक वही आडवाणी आज संसद सत्र नहीं चल पाने की वजह से इतने दुखी हैं कि इस्तीफा देने की सोच रहे हैं। संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार के हंगामे की भेंट चढ़ जाने से आहत आडवाणी ने अपनी व्यथा तीन सांसदों से बातचीत के दौरान जताई, जिनमें बीजेपी के सांसद नाना पटोले व टीएमसी के इदरीश अली भी शामिल थे। अली ने बाद में संवाददाताओं से कहा कि जब उन्होंने आडवाणी से पूछा कि क्या उनकी तबीयत ठीक है, तो आडवाणी ने कहा, ‘मेरा स्वास्थ्य अच्छा है, लेकिन संसद का स्वास्थ्य ठीक नहीं है।’

सवाल उठता है कि ‘संसद का स्वास्थ्य’ ठीक क्यों नहीं है? क्यों आरोप-प्रत्यारोप के बीच संसद काम नहीं कर पा रही? 2010 में जो सत्ता पक्ष था 2016 में वो विपक्ष है और जो उस वक़्त विपक्ष था आज सत्तासीन है। तब संसद की कार्यवाही 2जी मामले की भेंट चढ़ गई थी और आज नोटबंदी के मामले को लेकर सदन नहीं चल पा रहा। भारत के संसदीय इतिहास में संसद का साल 2010 का शीतकालीन सत्र अब तक के सबसे कम कार्यवाही के लिए जाना जाता है। तब सिर्फ 4 वित्तीय बिल पास हो पाए थे। पूरे सत्र में लोकसभा ने मात्र 7 घंटे 37 मिनट काम किया था, जबकि राज्यसभा ने 2 घंटे 44 मिनट। इस बार भी स्थिति कुछ अलग नज़र नहीं आ रही। मौजूदा सत्र में बस एक शुक्रवार का दिन बचा है और कई आवश्यक बिल लंबित पड़े हैं। अफ़सोस कि ‘संसद के स्वास्थ्य’ पर राजनीति हावी थी और है। हम संभवतः काम नहीं करने का एक नया रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं।