संसद के स्वास्थ्य की चिंता किसे है आडवाणी जी?

‘कभी-कभी कार्यवाही नहीं चलने से भी परिणाम निकलते हैं।’ 13 दिसम्बर 2010 की सुबह, संसद भवन परिसर में, 2001 में संसद पर हुए आतंकी हमले में शहीद सुरक्षाकर्मियों को श्रद्धांजलि देने के बाद आडवाणी ने संवाददाताओं से बातचीत के दौरान यह बात कही थी। तब भी संसद का शीतकालीन सत्र पूरी तरह से धुल गया था और सोनिया गांधी ने इसके लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया था। इसी आरोप के जवाब में आडवाणी ने ये बात कही। दरअसल, तब विपक्ष चाहता था कि तत्कालीन यूपीए सरकार 2जी घोटाले की जांच के लिए जेपीसी का गठन करे, जबकि सरकार इसके लिए राजी नहीं थी। आडवाणी ने संसद सत्र के ख़त्म होने के बाद एनडीए की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 14 दिसम्बर को फिर कहा, ‘मैं 1970 से सांसद हूँ, बीच में सिर्फ 2 साल छोड़ के, मुझे स्मरण नहीं कि इस प्रकार का कोई अधिवेशन पहले कभी हुआ हो, जब पूरे सत्र ही कार्यवाही न चली हो। लोकसभा में पहले दिन कार्यवाही चली, लेकिन जब भ्रस्टाचार के मामले पर सुषमा स्वराज को कांग्रेसी सांसदों ने बोलने नहीं दिया, तब एनडीए ने ये तय कर लिया कि हम सभी विषयों पर चर्चा तो चाहते हैं, पर अब अन्य विषयों पर अब चर्चा तभी होगी, जब सरकार जेपीसी की हमारी मांग मान लेगी।’

ख़बरों के मुताबिक वही आडवाणी आज संसद सत्र नहीं चल पाने की वजह से इतने दुखी हैं कि इस्तीफा देने की सोच रहे हैं। संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार के हंगामे की भेंट चढ़ जाने से आहत आडवाणी ने अपनी व्यथा तीन सांसदों से बातचीत के दौरान जताई, जिनमें बीजेपी के सांसद नाना पटोले व टीएमसी के इदरीश अली भी शामिल थे। अली ने बाद में संवाददाताओं से कहा कि जब उन्होंने आडवाणी से पूछा कि क्या उनकी तबीयत ठीक है, तो आडवाणी ने कहा, ‘मेरा स्वास्थ्य अच्छा है, लेकिन संसद का स्वास्थ्य ठीक नहीं है।’

सवाल उठता है कि ‘संसद का स्वास्थ्य’ ठीक क्यों नहीं है? क्यों आरोप-प्रत्यारोप के बीच संसद काम नहीं कर पा रही? 2010 में जो सत्ता पक्ष था 2016 में वो विपक्ष है और जो उस वक़्त विपक्ष था आज सत्तासीन है। तब संसद की कार्यवाही 2जी मामले की भेंट चढ़ गई थी और आज नोटबंदी के मामले को लेकर सदन नहीं चल पा रहा। भारत के संसदीय इतिहास में संसद का साल 2010 का शीतकालीन सत्र अब तक के सबसे कम कार्यवाही के लिए जाना जाता है। तब सिर्फ 4 वित्तीय बिल पास हो पाए थे। पूरे सत्र में लोकसभा ने मात्र 7 घंटे 37 मिनट काम किया था, जबकि राज्यसभा ने 2 घंटे 44 मिनट। इस बार भी स्थिति कुछ अलग नज़र नहीं आ रही। मौजूदा सत्र में बस एक शुक्रवार का दिन बचा है और कई आवश्यक बिल लंबित पड़े हैं। अफ़सोस कि ‘संसद के स्वास्थ्य’ पर राजनीति हावी थी और है। हम संभवतः काम नहीं करने का एक नया रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं।

 

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