व्हाट एन आईडिया सर जी!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए आज एक महत्वपूर्ण बात कही, जो देश में खेती के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हो सकती है। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे गाँवों में भी मिट्टी के परीक्षण के लिए प्रयोगशालाएं खोली जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे न केवल रोजगार के अवसर पैदा होंगे, बल्कि खेती भी वैज्ञानिक तरीके से हो सकेगी। प्रधानमंत्री अगर अपने इस आईडिया को जमीन पर ले आएं और बिना देरी किये इस पर अमल शुरू कर दें तो देश में एक नई हरित क्रांति की शुरुआत हो सकती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिलता है। हमारी पूरी अर्थव्यवस्था की विकास दर के मुकाबले कृषि क्षेत्र की विकास दर काफी कम रह गई है, जबकि अभी भी हमारे देश की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर करती है। एक तरफ दूसरे सेक्टर से जुड़े लोग अपेक्षाकृत तेजी से विकास कर रहे हैं, तो वहीँ कृषि से जुड़ी बड़ी आबादी बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ पा रही है। सरकार ने अपने आर्थिक सर्वे में ये कहा है कि मौजूदा वित्त वर्ष में कृषि क्षेत्र के 4.1 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है, जो पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 1.2 प्रतिशत ज्यादा है, पर सरकार ने कृषि पर नोटबंदी के विपरीत प्रभाव की आशंका भी जताई है। कृषि क्षेत्र के लिए बजट में कई प्रावधान भी किए गए हैं। पर ये सारे उपाय तब तक नाकाफी हैं, जब तक हम वैज्ञानिक खेती की ओर अपने किसानों को नहीं मोड़ पाते। ज्यादातर किसान अभी भी बिना मिट्टी का परीक्षण कराए फसल लगाते हैं। ऐसे में लागत और मेहनत के बराबर उत्पादन नहीं हो पाता। अगर सरकार जगह-जगह मिट्टी परीक्षण की छोटी-छोटी प्रयोगशालाएं खोलने को बढ़ावा दे, इसके लिए सब्सिडी व ट्रेनिंग उपलब्ध कराए तो देश के ज्यादातर किसान मिट्टी के हिसाब से फसलों का चयन कर पाएंगे। इससे उपज ज्यादा होगी और लागत भी कम आएगी। इससे देश में वैज्ञानिक तरीके से कृषि की एक नई संस्कृति पैदा होगी। इन सभी परीक्षण केंद्रों में एक चार्ट भी लगा होना चाहिए, जिससे किसान ये जान पाएं कि उनकी जमीन के लिहाज से कौन-कौन सी फसलें मुफीद होंगी। दूसरी तरफ ऐसा परीक्षण केंद्र शुरू करने वाले लोग सरकार की मदद से रोजगार भी पा सकेंगे। ये ‘सॉइल लैब’ छोटे-छोटे कस्बों में वैसे ही फैले होने चाहिए, जैसे कोई ‘पैथ लैब’ होता है। ऐसे केंद्रों पर मिट्टी उपचार के तरीके भी बताए जाने चाहिए और इसकी सुविधा भी होनी चाहिए। इसके अलावा वैज्ञानिक खेती के लिए जरुरी उपकरण, बीज, कीटनाशक, खाद आदि भी मुहैया कराया जाना चाहिए। ऐसे केंद्रों पर मिट्टी की गुणवत्ता या प्रकृति के मुताबिक गैर-परंपरागत फसलों, फूलों या फलों के खेती की जानकारी और प्रशिक्षण भी उपलब्ध कराए जा सकते हैं। इसके अलावा सिंचाई, परिवहन, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं की तरफ भी सरकार का ध्यान होना चाहिए। सबसे बड़ी बात कि इस देश में एक नई कृषि क्रांति लाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर काम करना होगा। ऐसे ‘सॉइल लैब्स’ के जरिए सरकारें किसानों के लिए एक नए युग की शुरुआत कर सकती है और कृषि क्षेत्र भी अन्य सेक्टर्स की तरह कदमताल करता हुआ देश के विकास में अहम योगदान दे सकता है।
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