सुंदर है ‘सुन्दरकाण्ड’

आज हनुमान जयंती है और उनकी ही इच्छा से मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहता हूँ क्योंकि इसका संबंध हमारी सोच और सामाजिक तानेबाने से भी है। बहुत दिनों से ही जब भी मैं श्रीरामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड सुनता तो आखिर-आखिर में आने वाली पंक्ति, ‘ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।’ को लेकर मन विचलित हो जाता। सवाल उठता कि प्रेम और भक्ति से सराबोर इस ग्रंथ में घृणा पैदा करने और भेद भाव को बढ़ावा देने वाली ये पंक्ति कहाँ से आ गई? इसके बावजूद जब सुन्दरकाण्ड पढ़ता तो इस पंक्ति को मैं भी पढ़ देता। एक तरफ सुन्दरकाण्ड पढ़ना अच्छा लगता और दूसरी ओर ये पंक्ति पढ़ता तो बुरा भी लगता। अजीब विरोधाभास था। मुझे लगता था कि वे तुलसीदास ऐसा कैसे लिख सकते हैं, जिनकी आराध्या माँ सीता खुद स्त्री हों? या जिनकी वजह से इस पूरे अध्याय का नाम ‘सुन्दर’ पड़ा, वे हनुमान जी खुद वानर रूप में हों और तुलसी उन्हें गुरू मानते हों? गीताप्रेस जैसे प्रकाशन संस्थान भी कहते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास जी के हाथ की लिखी हुई कोई प्रामाणिक प्रति उपलब्ध नहीं हो पाई है। ऐसे में मुझे शक होता था कि तुलसीदास ने ऐसा लिखा होगा! मुझे लगता था कि किसी ने बाद में ये पंक्तियां जोड़ दी होंगी! इन सब के बावजूद मैं ग्लानि भाव से ही सही, पर अब तक करीब तीन-चार बार ये पढ़ गया। लेकिन, अभी, फरवरी महीने में झारखंड के गोड्डा स्थित अपने गांव लुकलुकी जाना हुआ। वहां काली स्थान के प्रांगण में स्थित हनुमान मंदिर में प्रभु की प्रतिमा के सामने सुन्दरकाण्ड पढ़ने की इच्छा हुई। शुरुआत से ही पाठ में आनंद आने लगा। अलग अलग भावों के बीच उतरता-चढ़ता, पढ़ता जा रहा था कि फिर से वही पंक्ति मेरे सामने आ गई। लेकिन इस बार प्रभु की ही प्रेरणा से मैं रुक गया। हनुमान जी की प्रतिमा की ओर देखा और सोचा कि इसे पढ़ना ठीक नहीं है, तुलसी ये नहीं लिख सकते। प्रभु तो दयालु होते हैं, कोई भेद नहीं करते, वे तो घट-घट वासी होते हैं और खुद स्वयं आप रुद्र होकर भी वानर के रूप में अवतरित हुए। मैंने सोच लिया कि प्रभु इच्छा से ही, पर अब से मैं ये पंक्ति नहीं पढ़ूंगा भले पाठ अधूरा रह जाए। मैं इस पंक्ति को छोड़कर आगे बढ़ा, लेकिन फिर भी मन से संशय नहीं मिटा। मैं आखिरी पंक्तियां पढ़ने ही वाला था कि प्रतिमा के ऊपर से उड़हुल (गुड़हल/जवा कुसुम) का एक फूल मेरे ठीक सामने जमीन पर आ गिरा। मन खुश हो गया। मैंने आनंद से फूल को उठाकर हनुमान जी को प्रणाम किया। मैंने इसे इस संकेत के तौर पर लिया कि प्रभु मेरे द्वारा उस पंक्ति को नहीं पढ़े जाने से प्रसन्न ही हुए और पहली बार मेरे सुन्दरकाण्ड का पाठ सुंदरतम तरीके से संपन्न हुआ। आप चाहें तो कह सकते हैं कि फूल हवा के झोंके से गिर गया होगा। हो सकता है। पर उस दिन के बाद से कम से कम इस पतित व अज्ञानी के मन की दुविधा तो खत्म हो चुकी है।सुन्दरकाण्ड अब और सुंदर लगने लग गया है।