छुटकी (कहानी)

पापा की छुटकी अब बड़ी हो गई थी। उसे अपने फैसले लेने का अधिकार था। वो जिससे शादी करना चाहती थी, वो अनुपम किसी और जाति का था और यह बात छुटकी के पापा विश्वंभर को पसंद नहीं थी। इस बात को लेकर घर में पिछले कुछ दिनों से तनाव का माहौल था। विश्वंभर ने साफ कर दिया था कि उनकी छुटकी किसी भी हालत में अनुपम से शादी नहीं करेगी, जबकि छुटकी ने निश्चय कर लिया था कि वो अगर शादी करेगी तो अनुपम से ही करेगी। छुटकी की मां सावित्री भी इस मामले में उसके पिता विश्वंभर के साथ खड़ी थी। बिहार के बांका में रहने वाली छुटकी के पिता का अपना अच्छा खासा व्यवसाय था। छुटकी पढ़ाई में काफी अच्छी थी और पटना यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद अब बांका से ही निकलने वाले एक अखबार के लिए रिपोर्टिंग करती थी। अपने इलाके की पहली महिला पत्रकार थी छुटकी..एकदम बेबाक…अपने पापा की ही तरह। अनुपम कथित तौर पर छोटी जाति से ताल्लुक रखता था। छुटकी और अनुपम ने बांका के एक ही स्कूल से 12वीं तक की पढ़ाई की थी। दोनों पहली क्लास से ही साथ पढ़े थे और बहुत अच्छे दोस्त थे। अनुपम 12वीं के बाद इंजीनियरिंग करने सिंदरी चला गया और छुटकी पटना चली गई। इसके बावजूद दोनों फोन पर अक्सर बात-चीत किया करते थे। दोनों की दोस्ती न जाने कब प्यार में बदल गई थी और दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया। अनुपम पढ़ाई पूरी करने के बाद बिहार सरकार के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर बन गया था। अनुपम पढ़ाई में होशियार था, लेकिन छुटकी के घरवालों को हमेशा लगता था कि वो आरक्षण मिलने की वजह से ही आगे बढ़ पाया है, जबकि हकीकत यह थी कि अनुपम ने कभी भी आरक्षण का लाभ नहीं लिया और हमेशा सामान्य कोटे से ही परीक्षा देता था। उसे पता था कि उसे आरक्षण की जरूरत नहीं है। खैर, घरवालों को कभी अनुपम और छुटकी की दोस्ती को लेकर कुछ खास ऐतराज कभी नहीं रहा। पर पिछले साल होली के मौके पर जब छुटकी ने अपनी मां को यह बात बताई थी कि वो अनुपम से प्यार करती है और शादी करना चाहती है, तब से उसके घरवालों ने अनुपम के उनके घर आने पर पाबंदी लगा दी थी। हालांकि छुटकी और अनुपम बीच-बीच में छिप-छिपाकर मिल ही लिया करते थे। छुटकी का असली नाम प्रतिभा था। वो तो प्यार से सब उसे छुटकी बुलाते थे। वो बड़ी हो गई थी, लेकिन अभी भी अपने मां-पापा के लिए छुटकी ही थी। शादी को लेकर अपने फैसले को बदलने का छुटकी पर भारी दबाव था। घरवालों ने छुटकी को खूब समझाने की कोशिश की थी, लेकिन छुटकी को अपना फैसला खुद करना आता था। वैसे भी वो यह फैसला काफी सोच समझकर ले रही थी। उसकी कलम की पूरे जिले में धाक थी। अधिकारी से लेकर नेता तक उसकी कलम की ताकत से वाकिफ थे। दूसरों के अधिकार के लिए लड़ने वाली छुटकी भला अपने अधिकार पर हमला कैसे बर्दाश्त करती? ऐसा नहीं है कि छुटकी अपने मां और पिताजी की इज्जत नहीं करती थी। उसे अपने मां-पापा से बेहद लगाव था। विश्वंभर अब भी लोगों के सामने अपनी बेटी की तारीफ करते नहीं अघाते थे। पड़ोस में रहने वाली काकी तो हंसकर अक्सर कहा करती थीं कि लगता है ईश्वर ने सिर्फ विश्वंभर को ही बेटी दी है। हालांकि पिछले एक साल से विश्वंभर छुटकी से नाराज रहते थे या कम से कम उसके सामने नाराजगी जाहिर करते थे। छुटकी आवाज भी देती तो जान बूझकर एक दो बार अनसुना कर दिया करते थे। खैर देखते देखते कैसे एक साल बीता पता भी नहीं चला। छुटकी ने इस बीच घर में साफ साफ कह दिया कि वो इस साल अप्रैल में अनुपम से शादी कर लेगी। हालत यह हो गई कि अब एक घर में रहने के बावजूद विश्वंभर ने छुटकी से बात करना भी बंद कर दिया था। दूसरों के सामने अपनी बेटी की तारीफ करते नहीं अघाने वाले विश्वंभर अब छुटकी का जिक्र होते ही बात को टालने की कोशिश करने लगते थे। मां सावित्री भी आजकल छुटकी से ठीक से बात नहीं करती थी। ये वही छुटकी थी, जिसके लिए दोनों ने पता नहीं कितने मंदिरों में मन्नतें मांगी थीं। दरअसल विश्वंभर और सावित्री की शादी के दस साल बाद छुटकी पैदा हुई थी। छुटकी को विश्वंभर अपनी जान से ज्यादा प्यार करते थे। लेकिन समाज में अपनी बदनामी के डर से वे छुटकी की बात नहीं मान रहे थे। इतना सब हो जाने के बावजूद अभी तक न तो छुटकी ने कभी मां-पापा के साथ बदतमीजी की थी और न ही कभी उसके मां-पापा ने उस पर कभी हाथ उठाया था। पर आज शाम को जो कुछ हुआ उसने विश्वंभर और छुटकी दोनों को झकझोर दिया था। छुटकी से आज काफी दिनों बाद उनकी बात हुई, लेकिन धीरे धीरे बात बहस में बदल गई और छुटकी ने उनके साथ बदतमीजी की थी। विश्वंभर ने भी पहली बार छुटकी पर हाथ उठाने की कोशिश की थी, लेकिन छुटकी ने विश्वंभर का हाथ पकड़ लिया था। बिस्तर पर लेटे लेटे विश्वंभर को आज की रात नींद भी नहीं आ रही थी। उन्होंने सोच लिया था कि चाहे जो भी हो वे छुटकी और अनुपम की शादी नहीं होने देंगे। जरूरत पड़ी तो किसी भी हद तक जाएंगे। यही सब सोचते सोचते न जाने कब विश्वंभर की आंख लग गई। दूसरे दिन छुटकी को घर से बाहर नहीं निकलने दिया गया। उसके अखबार से फोन आया तो विश्वंभर ने कह दिया कि छुटकी बीमार है। छुटकी अब अपने उसी माता पिता के पास कैद थी, जिनकी बाहों में वो कभी खुद को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करती थी। वो अनुपम को भी खबर करे तो कैसे, फोन तो विश्वंभर ने जब्त कर लिया था और उसे कमरे में बंद कर दिया था। आज तो उसे खाना भी नहीं मिला था। लेकिन उसने भी निश्चय कर लिया था कि वो अगर शादी करेगी तो अनुपम से ही। उसे पूरा विश्वास था कि उसके पापा शादी के बाद उसे स्वीकार कर लेंगे। उसे पता था कि इस संसार में उसे सबसे ज्यादा प्यार उसके पापा ही करते थे, शायद अनुपम से भी ज्यादा। यह और बात है कि समाज में बदनामी के डर से आज उसके पापा उसके सही फैसले का भी विरोध कर रहे थे। अनुपम में कमी ही क्या थी? सरकारी नौकरी में था। उसके पिता रिटायर्ड चीफ इंजीनियर थे। गांव में काफी जमीन थी, मां शिक्षिका थी। बहन की शादी रांची के धनाड्य परिवार में हुई थी। उसने अपने पापा को यह समझाने की बेहद कोशिश की थी, लेकिन विश्वंभर के मन में समाज में बदनामी की बात घर कर गई थी और वे छुटकी की बात सुनने को तैयार नहीं थे। छुटकी ने अपनी मां सावित्री को भी समझाने की कोशिश की थी। उसे लगा था कि सावित्री औरत है और शायद उसकी बात समझ जाए। लेकिन सावित्री भी इस मामले में विश्वंभर के विचारों से सहमत थी और बेटी की शादी छोटी जात के आदमी से करना अपने कुल-खानदान की शान के खिलाफ समझती थी। उधर, बंद कमरे में बिना खाना-पानी के छुटकी को आज 15 घंटे बीत चुके थे। उसके गुलाबी होंट प्यास की वजह से सूखकर सफेद हुए जा रहे थे। छुटकी को अपना बचपन याद आ रहा था। उसके पापा ही तो उसे सारी बात बताते थे। शादी के दस साल बाद जब बांका अस्पताल में उसका जन्म हुआ था, तब विश्वंभर ने तीन दिनों तक पूरे समाज में भोज दिया था। वही छुटकी आज भूख और प्यास से तड़प रही थी, लेकिन विश्वंभर उसी समाज की खातिर उसकी बात मानने को तैयार नहीं थे। उस दिन शाम में छुटकी के कमरे का दरवाजा खोला गया। विश्वंभर ने अपनी कड़क आवाज में छुटकी से कहा कि आखिरी बार सोचने को कहा और परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दे डाली। जिस बाप ने हमेशा प्यार से पुकारा था, वो आज उसी छुटकी को धमकियां दे रहा था। छुटकी भला कहां मानने वाली थी, वो अपने पापा की ही बेटी थी। उसने साफ कह दिया कि वो अनुपम से ही शादी करेगी, चाहे परिणाम कुछ भी हो। विश्वंभर शायद ऐसे दो टूक जवाब की अपेक्षा नहीं कर रहे थे। लगभग कांपते हुए विश्वंभर तेजी से बाहर की ओर गए और रसोईघर से एक चाकू उठा लाए। क्या यह वही बाप था, जो हमेशा अपनी लाडली को सीने से चिपकाए घूमता था? खैर, आज विश्वंभर वो विश्वंभर नहीं था। आज उसे बेटी से ज्यादा समाज और ‘इज्जत’ की चिंता थी। विश्वनाथ ने चिल्लाते हुए छुटकी से कहा कि उनके लिए कुल-खानदान की इज्जत सबसे ज्यादा प्यारी है और इसे बचाने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। छुटकी का दिल भी पिता के इस रूप को देखकर बैठा जा रहा था। उसके पापा उसके सामने चाकू लेकर खड़े थे और वो भी उसे मारने! छुटकी के दिल में डर नहीं था, लेकिन दुख का तो मानो सागर उमड़ रहा था, जिसकी कुछ बूंदें उसकी आंखों के रास्ते लगातार बाहर आ रही थीं। उसके कंठ से आवाज नहीं निकल रही थी। बड़ी मेहनत करके उसने फिर दोहराया कि वो अनुपम से ही शादी करेगी। छुटकी की इस ‘ढिढाई’ से बिफरी सावित्री ने उसे जोर का चांटा जड़ दिया। छुटकी का सिर चकरा गया। पत्रकार बनने से पहले जिस प्रतिभा का नाम तक कई लोगों को नहीं पता था, जिसे उसके मां-पापा बचपन से ही इतना प्यार करते थे कि कभी छुटकी के अलावा कुछ और नहीं बुलाते थे, जिसे खिलाए बिना जो सावित्री पानी तक नहीं पीती थी। जिसके कहने पर विश्वंभर पूरा बाजार उठाकर ले आते थे। वो छुटकी आज अपने ही मां-पिता के सामने मानो बलि की वेदी पर पड़ी हुई थी। हाय! मां की वो ममता और पापा का वो प्यार कहां खो गया था? आज विश्वंभर आपा खो चुके थे। उन्हें अपनी बेटी कि सिसकियां सुनाई नहीं पड़ रही थीं और उसकी आंखों के आंसू दिखाई नहीं पड़ रहे थे। यही छुटकी बचपन में जब कभी रोती थी तो विश्वंभर का कलेजा कटने लगता था। किसी भी कीमत पर वो छुटकी की हर मांग पूरी करते थे। छुटकी को बुखार आता, तो विश्वंभर रात रात भर नहीं सोते थे। रतजगे के बाद जब विश्वंभर अपने दफ्तर पहुंचते थे, उनके मातहत काम करने वाले लोग उनकी आंखें देखकर समझ जाते थे कि शायद छुटकी की तबीयत ठीक नहीं है। छुटकी के सिवाय विश्वंभर और सावित्री के और था ही कौन? लेकिन दस साल की मन्नतों के बाद जिस संतान को उन्होंने पाया था, जिसकी हर खुशी पर वे खुश होते थे और जिसका हर दर्द उनका दर्द होता था, आज उसकी कोई अहमियत नहीं रह गई थी? छुटकी अब धीरे धीरे निष्प्राण होती जा रही थी। जो कुछ हो रहा था, उसकी कल्पना तक भी उसने कभी नहीं की थी। उसने इस बार बड़ी मुश्किल से, सिसकियों में लिपटे स्वर में एक बार अपने मम्मा-पापू को समझाने की कोशिश की। उसने इस बात का यकीन दिलाना चाहा कि अनुपम बुरा लड़का नहीं है और वो यह फैसला सोच समझकर ले रही है। इससे समाज में कोई बदनामी नहीं होगी। उसने गिड़गिड़ाते हुए स्वर में विश्वंभर से कुछ और कहना चाहा लेकिन सिर्फ पापू…बोलकर चुप हो गई। छुटकी के कांपते होंट उसे कुछ बोलने ही नहीं दे रहे थे, सिसकियां मानो उसके हृदय को चीरकर बाहर आ रही थीं। इधर, विश्वंभर ने मानो दिल पर पत्थर रख लिया था और तय कर लिया था कि समाज के आगे छुटकी क्या खुद की भी नहीं सुनेंगे। खुद की सुनते तो शायद छुटकी को अब तक गले से लगा लिया होता। विश्वंभर को यह बात भी सता रही थी कि जिस बेटी की उंगली पकड़कर उन्होंने उसे चलना सिखाया था, जिस बेटी को उन्होंने जान से भी ज्यादा चाहा था, जो छुटकी उनका संसार थी, वही आज उनकी सुनने को तैयार नहीं थी? आज अनुपम की अहमियत उसके पापा से ज्यादा हो गई थी? विश्वंभर ने तय कर लिया। चाहे जो भी वो आज छुटकी को झुकने पर मजबूर कर देगा। विश्वंभर के इरादों की ही तरह हाथ में पड़े चाकू पर भी विश्वंभर की पकड़ मजबूत हुई जा रही थी। अबतक सावित्री को अनहोनी की आशंका सताने लगी थी। सावित्री को लगने लगा कि विश्वंभर आपा खो चुके हैं। सावित्री छुटकी की बात से सहमत नहीं थी, लेकिन उसे खोना तो बिल्कुल नहीं चाहती थी। सावित्री ने छुटकी की ओर बढ़ रहे विश्वंभर के पैरों को जोर से पकड़ लिया, लेकिन विश्वंभर को रोकना सावित्री के लिए आसान नहीं था। उधर, छुटकी के प्राण क्या लेने थे? उसके प्राण तो अपने पिता के इस रूप को देखकर पहले ही जा चुके थे। पापा की प्यारी छुटकी लगभग बेहोशी की अवस्था में जा चुकी थी। दिमाग चकरघिन्नी की तरह घूम रहा था। मन में बस बचपन की कुछ बातें घूम रही थीं। करीब 5 साल की थी वो जब मंदार मेले में पापा से बिछुड़ गई थी और उसके पापा छुटकी-छुटकी चिल्लाते हुए पूरे मेले में उसे ऐसे ढूंढ रहे थे जैसे अगर वो नहीं मिली तो उनके प्राण ही छूट जाएंगे। वैसे ही वो अपने पापा को ढूंढ रही थी। दोनों के प्राण एक दूसरे में बसते थे। जब मेले में करीब तीस मिनट की मशक्कत के बाद छुटकी नजर आई थी तो विश्वंभर ने उसे ऐसे प्यार किया था, जैसे तीस साल बाद उसे देखा हो। विश्वंभर इस घटना के चार दिनों बाद तक अपने दफ्तर नहीं गए थे और न छुटकी को स्कूल जाने दिया था। वे बस छुटकी को अपने पास लेकर ही बैठे रहते थे। इधर छुटकी का दिमाग अब काम करना बंद करने लगा था। उसने सोचा नहीं था कि उसके वही पापा कभी उसकी जान लेने तक पर उतारू हो जाएंगे। छुटकी का बेजान मन व शरीर अपने पिता का प्रतिरोध कर पाने की स्थिति में भी नहीं था। साढ़े छह फीट लंबे विश्वंभर को रोकने में सावित्री भी नाकाम हो चुकी थी और छुटकी का नाम उन तमाम छुटकियों की लिस्ट में शामिल होने जा रहा था, जो झूठी शान और झूठी इज्जत के नाम पर मार दी जाती हैं और वो भी अपनों के हाथों। विश्वंभर अब छुटकी के बिल्कुल सामने खड़े थे। एक बार के लिए विश्वंभर को भी अपनी पुरानी छुटकी की याद आई, लेकिन समाज में होने वाली बदनामी का डर प्यार पर भारी पड़ा। निष्प्राण सी छुटकी अब सिसकियां भी नहीं ले पा रही थी। बस फर्श पर पड़े पड़े अपने पिता को निहार रही थी। इधर सावित्री विश्वंभर को रोकने का हर संभव प्रयास कर रही थी। सावित्री की ममता जाग चुकी थी। उसे अब लगने लगा था कि बेटी बचेगी तभी इज्जत बचेगी और जब बेटी ही नहीं रहेगी तो यह समाज और यह संसार ही उसके किस काम का रहेगा। विश्वंभर को अब एक ममतामयी मां की मजबूत पकड़ से निकलने में दिक्कत आ रही थी। विश्वंभर को रोकने वाली औरत अब उनकी पत्नी सावित्री नहीं, बल्कि छुटकी की मां सावित्री थी। पता नहीं क्यों पर एकबारगी विश्वंभर की आंखों में भी आंसू भर आए थे। लेकिन उनका निश्चय दृढ़ था। समाज में अपनी इज्जत उनके लिए ज्यादा प्यारी थी। सावित्री के साथ झड़प में उनके हाथ से चाकू गिर पड़ा। विश्वंभर छुटकी का गला दबाने की नीयत से उसकी ओर झपटे। अगले ही पल सबकुछ खत्म हो गया होता अगर विश्वंभर के कानों में पड़ोस की रहने वाली छोटी सी सुष्मिता के रोने की आवाज न आई होती। वो शायद अपनी मां से किसी चीज की जिद कर रही थी और बार बार पापा….पापा…बोलकर रोई जा रही थी। छुटकी भी तो बचपन में जब भी मां से नाराज होकर रोती, ऐसे ही अपने पापा को पुकारकर रोती थी। विश्वंभर सुष्मिता के रोने की आवाज सुनकर रुक गए थे। छुटकी की ओर बढ़े हाथ जोर जोर से कांप रहे थे। पैरों में खड़े रहने तक की भी ताकत महसूस नहीं हो रही थी। लंबे चौड़े विश्वंभर धम्म से जमीन पर बैठ गए। विश्वंभर का सिर चकरा रहा था और उनकी आंखों के सामने उनकी छोटी सी छुटकी घूम रही थी और मानो कानों में उसकी तोतली आवाज गूंज रही थी। 25 साल पहले इसी मार्च महीने में उनकी छुटकी का जन्म हुआ था। नर्स ने छुटकी के जन्म के तुरंत बाद छुटकी को लाकर सबसे पहले विश्वंभर के हाथों में दिया था। विश्वंभर ने पहले कभी किसी बच्चे को अपनी गोद में नहीं लिया था, लेकिन अपनी छुटकी को कुछ इस तरह से अपने सीने से सटाकर रखा था, जैसा कि शायद सावित्री भी नहीं कर पाती। घर आने के बाद भी सावित्री और छुटकी दोनों की सेवा विश्वंभर खुद अपने हाथों से किया करते थे। विश्वंभर की आंखों के सामने अपनी छुटकी का हंसता हुआ चेहरा घूम रहा था। विश्वंभर के कानों में अपनी छुटकी की वो पहली आवाज गूंज रही थी, जब छुटकी ने पहली बार न जाने अपनी तोतली आवाज में क्या कहा था और विश्वंभर को वह शब्द ‘पापा’ सुनाई पड़ा था। तब घर में मौजूद सारे लोग विश्वंभर पर हंसे भी थे। लेकिन विश्वंभर ने छुटकी के पहले बार ‘पापा’ बुलाने पर अच्छी खासी पार्टी दे दी थी। एक बार जब विश्वंभर की बाइक सड़क पर फिसल गई थी और छुटकी बाइक की पेट्रोल टंकी पर बैठी हुई थी, तब विश्वंभर ने सबकुछ छोड़कर छुटकी को पकड़ लिया था और विश्वंभर का पैर टूट गया लेकिन उसने छुटकी पर आंच भी नहीं आने दी थी। इधर, इन्हीं ख्यालों में डूबे विश्वंभर न जाने कब अचेत हो गए और जब होश आया तो खुद को अस्पताल में पड़ा पाया। सिरहाने पर उनकी प्यारी छुटकी बैठी थी और उनका माथा सहला रही थी। झूठी इज्जत और शान के लिए विश्वंभर कल इसी छुटकी की हत्या करने वाले थे। विश्वंभर ने छुटकी को देखा तो लपककर उसे गले से लगा लिया। छुटकी विश्वंभर के आंसूओं से लगभग भीग चुकी थी। बाप-बेटी का प्रेम देखकर सावित्री भी अपने आंसू नहीं रोक पा रही थी। विश्वंभर को इस बात का अहसास हो गया था कि वे झूठी शान और झूठी इज्जत के नाम पर क्या करने जा रहे थे। उनका दिल अपराध बोध से बैठा जा रहा था। वे खुद को माफ नहीं कर पा रहे थे, हालांकि उनकी प्यारी छुटकी ने इतना सबकुछ होने के बाद भी उन्हें माफ कर दिया था। आखिरकार वो उनकी बेटी थी। खैर, विश्वंभर बिना वक्त गंवाए अगले ही दिन अनुपम के घर पर छुटकी का रिश्ता लेकर पहुंचे। एक महीने बाद 12 अप्रैल को अनुपम और छुटकी की शादी तय हुई। देखते देखते शादी का दिन भी आ गया। विश्वंभर का घर दुल्हन की तरह सजा था। छुटकी बेहद सुंदर लग रही थी। बारात भी आ गई थी। कन्यादान का मूहुर्त बीता जा रहा था, लेकिन विश्वंभर विवाह मंडप पर नजर नहीं आ रहे थे। छुटकी उन्हें ढूंढती हुई उनके कमरे में पहुंची। विश्वंभर ध्यानमग्न होकर कुछ लिख रहे थे और उनकी आंखों में आंसू थे। वे इतने तल्लीन थे कि छुटकी की मौजूदगी तक का उन्हें अहसास नहीं था। इधर, जब छुटकी की नजर उस कागज पर पड़ी तो वो सन्न रह गई। विश्वंभर सुसाइड नोट लिख रहे थे। उन्होंने छुटकी के साथ जो कुछ किया था, उसके भार से वे लगातर दबे चले जा रहे थे। भले ही बाहर से वे खुश नजर आते थे, लेकिन अंदर ही अंदर वो घुटते जा रहे थे। छुटकी ने झपटते हुए विश्वंभर के हाथों से कागज का वो टुकड़ा छीन लिया और रोते हुए पिता से लिपट गई। विश्वंभर को समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। जिस दिन उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ था, उसी दिन उन्होंने यह तय कर लिया था कि वे छुटकी का कन्यादान करने के बाद खुद को खत्म कर लेंगे। पाप के इस बोझ के साथ जीना उनके लिए संभव नहीं था। पाप की गठरी ढोनी आसान नहीं होती। झूठी शान के लिए वे जिस बेटी की हत्या करने पर उतारू थे, उस बेटी ने अपने माता-पिता की इज्जत की खातिर उस रात की बात अपने सीने में ही दफन कर दी थी और अपने होने वाले पति अनुपम को भी इस राज का हमराज नहीं होने दिया था। लेकिन विश्वंभर खुद को क्या जवाब देते? खैर, एक बार फिर से छुटकी ने उन्हें गलत काम करने से रोक दिया था। अपने पिता के सीने से लगकर छुटकी उन्हें अब अपनी सौगंध दे रही थी। छुटकी को पता था कि उसके पापा की जिद के सामने अगर कोई खड़ी हो सकती थी तो वो छुटकी ही थी। अगले पल विश्वंभर अपनी छुटकी को कुछ इस कदर प्यार कर रहे थे, जैसे गंगा में पाप धोने के अहसास के बाद कोई पुजारी शुद्ध मन से मंदिर में पूजा करता है।