‘बेजुबान’

अखबार में जगह की कमी की वजह से मेरी पहली कहानी ‘बेजुबान’ काफी एडिट हो गई थी, इसलिए मूल कहानी को यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ। आप की प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।

‘बेजुबान’

उस बेजुबान ‘गोविंद’ का जन्म उमाकांत के घर पर ही हुआ था। वो उमाकांत को देखते ही उनकी तरफ दौड़ पड़ता था, उमाकांत की जान भी मानो उसी में बसती थी। ‘गोविंद’ छोटा ही था जब उसकी मां ‘गौरी’ की बीमारी से मौत हो गई थी। ‘गोविंद’ ने शायद यह महसूस भी किया होगा कि किस प्रकार से उमाकांत व उनकी पत्नी पद्मा ने उसकी मां ‘गौरी’ की मरने से पहले सेवा की थी। गोविंद भी अब करीब 12 साल का हो चुका था और खेती के काम में उमाकांत की बहुत मदद करता था। चाहे खेत की जुताई हो या फिर अनाज की ढुलाई, वो बेजुबान बिना थके पूरा दिन मेहनत करता था। उमाकांत व पद्मा की गृहस्थी की गाड़ी ठीक से चल रही थी। एक बेटी थी छाया, वो पढ़ाई में अच्छी थी और बीएड करके जमशेदपुर के एक नामी स्कूल में पढ़ाती थी। उसकी शादी भी अच्छे घर में हुई थी। उमाकांत व पद्मा को एक बेटा भी था, जिसका नाम पारस था। पारस भी पढ़ाई में होशियार था और बड़ी मेहनत व आर्थिक तंगी के बीच उसने आईआईटी दिल्ली से बीटेक किया था और अब बढ़िया नौकरी कर रहा था। पारस साल में एक बार दुर्गा पूजा में घर आ पाता था, छाया भी जमशेदपुर में रहती थी, लेकिन कम ही गांव आ पाती थी। गांव के अपने घर में कुल मिलाकर अब उमाकांत और पद्मा ही रह गए थे। उमाकांत अभी भी खुद से खेती करते थे और ‘गोविंद’ उनकी खूब मदद करता था। उमाकांत और पद्मा भी बिना ‘गोविंद’ को खिलाए खुद नहीं खाते थे। ‘गोविंद’ भले ही बेजुबान था लेकिन उमाकांत उसके हाव-भाव से ही उसकी जरूरतें समझ जाते थे। घर में अब किसी प्रकार की दिक्कत नहीं थी। उमाकांत साल भर की मेहनत के बाद खेती से जो कमाते थे, उससे कहीं ज्यादा उनका बेटा उन्हें अब हर महीने भेज दिया करता था। उमाकांत व पद्मा बच्चों के साथ नहीं रह पाते थे बस यही एक कमी उन्हें खलती थी। पारस और छाया दोनों उन्हें अपने पास बुलाते थे, लेकिन गांव और ‘गोविंद’ को छोड़ना उन्हें गंवारा नहीं था सो दोनों ने गांव में ही रहना तय कर लिया था। खैर, जीवन की गाड़ी ठीक से ही चल रही थी। भला हो मोबाइल फोन का कि दिन में कम से कम एक बार बेटी और बेटे से बात हो जाती थी। मोबाइल फोन के जरिए ही नाती-पोते की आवाज भी सुन लेते थे। गांव में रहने के बावजूद उमाकांत व पद्मा को फुर्सत नहीं रहती थी। ग्रामीणों के बीच दोनों की छवि बढ़िया थी, लिहाजा घर पर लोगों का आना जाना लगा रहता था। पद्मा कुछ गरीब बच्चों को पढ़ाती भी थी। भगवान की दया से अब घर भी अच्छा बन गया था। ‘गोविंद’ भी पहले फूस की गुहाल (गोशाला) में रहता था, लेकिन अब उसके रहने के लिए भी बढ़िया इंतजाम कर दिया गया था। सब ठीक ही चल रहा होता अगर उस रात उमाकांत घर की आंगन में फिसल कर गिरे नहीं होते। बहुत जोर से चोट लगी थी। रात भर उनकी कराह सुनकर पद्मा परेशान थी और ‘गोविंद’ की आंखों से तो जो अश्रुधारा बहनी शुरू हुई वो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। वो रात बड़ी लंबी साबित हो रही थी। मामूली चोट समझकर दोनों ने किसी को फोन भी नहीं किया था। लगा छाया और पारस व्यर्थ ही परेशान हो जाएंगे। बेजुबान ‘गोविंद’ के पास आवाज नहीं थी, लेकिन अगर किसी ने उमाकांत के लिए ईश्वर से सबसे ज्यादा प्रार्थना की होगी तो वो ‘गोविंद’ ही होगा। उस लंबी रात के बाद जैसे ही सुबह हुई वैसे ही ग्रामीणों की सहायता से उमाकांत को पास के शहर में स्थित अस्पताल ले जाया गया। पद्मा साथ ही गई थीं। घर पर सिर्फ ‘गोविंद’ था। ऐसा पहली बार हुआ था, जब वो घर पर अकेला रह गया था। लेकिन उसे अपने खाने पीने की चिंता नहीं थी, बस उमाकांत की चिंता थी। उसे नहीं पता था कि उसके मालिक को हुआ क्या था। उधर, एक्सरे के बाद डॉक्टरों ने पाया कि उमाकांत के पैर की हड्डी में फ्रैक्चर है। अब तक पारस और छाया को भी जानकारी हो चुकी थी। छाया अपने पति के साथ पिता को देखने रवाना हो चुकी थी। इस बीच डॉक्टरों ने उमानाथ के पैर पर प्लास्टर चढ़ाया और रॉड लगाने के लिए ऑपरेशन करने की जरूरत बताई। पारस चाहता था कि ऑपरेशन दिल्ली में हो, सो छाया, उसके पति रविकांत व पद्मा उमाकांत को ट्रेन से लेकर दिल्ली चले आए। जिंदगी में पहली बार उमाकांत अपने बेटे के घर दिल्ली आए थे, लेकिन वो भी इस हालत में। उन्हें अब अपने पैर से ज्यादा चिंता गांव में अकेले छूट गए ‘गोविंद’ की हो रही थी। उधर, चार दिन बीत जाने के बाद भी उमाकांत और पद्मा को नहीं देखकर गोविंद का दिल मानो बैठा जा रहा था। उमाकांत ने पास में रहने वाले अरविंद को ‘गोविंद’ के खाने का इंतजाम करने को कह दिया था, लेकिन खाना ‘गोविंद’ के गले के पार ही नहीं हो रहा था। उस बेजुबान को भला उमाकांत के अलावा और कौन समझा पाता कि सब ठीक है, घबराने की कोई जरूरत नहीं है। उमाकांत भी समझ रहे थे कि ‘गोविंद’ की क्या हालत होगी, लेकिन वे लाचार थे। उमाकांत ने पद्मा को गांव लौटने को कहा था, लेकिन पद्मा भला अपने बीमार पति को छोड़कर कैसे गांव लौटती। पारस और छाया को ‘गोविंद’ की कोई खास चिंता थी भी नहीं। एक दिन बाद उमाकांत के पैर का ऑपरेशन कर दिया गया, लेकिन परिवारवालों ने यह तय किया कि कम से कम एक महीने तक उमाकांत को गांव वापस नहीं लौटने दिया जाएगा। डॉक्टर भी इसी पक्ष में थे, यहां रहने पर मरीज की स्थिति का फॉलोअप करना आसान था। उमाकांत मानने को तैयार नहीं थे, उन्हें सबसे ज्यादा चिंता ‘गोविंद’ की थी। अरविंद ने उमाकांत को बताया था कि जबसे वे गए हैं ‘गोविंद’ ने खाना पीना ही छोड़ दिया है। उमाकांत खुद आने की स्थिति में होते तो किसी की भी नहीं सुनते, पर पैर का ऑपरेशन हुआ था सो खुद ब खुद आ नहीं सकते थे। देखते देखते पंद्रह दिन बीत गए और सोलहवें दिन की सुबह अरविंद का फोन आया। अरविंद ने उमाकांत को बताया कि ‘गोविंद’ की हालत खराब है और यहां तक कि उसकी जान भी जा सकती है। अब तो उमाकांत बगावती हो गए। क्या डॉक्टर, क्या पद्मा, क्या बेटा और क्या बेटी…किसी की भी सुनने को तैयार नहीं। उमाकांत की जिद के आगे किसी की एक नहीं चली। आखिरकार उमाकांत अपने बेटे और बीवी पद्मा के साथ अपने गांव लौटे, लेकिन इस शर्त पर कि दस दिन बाद वे वापस चेकअप के लिए दिल्ली जाएंगे। उमाकांत ने घर पहुंचकर जैसे ही ‘गोविंद’ को आवाज दी, गोविंद के मानो जाते हुए प्राण लौट आए। उमाकांत ने ‘गोविंद’ को जिस तरह से प्यार किया वो तो शायद कोई अपने बच्चे को भी नहीं करता होगा। ‘गोविंद’ अपने तरीके से खुशी का इजहार कर रहा था। दूसरे दिन सुबह सूर्यास्त के काफी पहले से ही ‘गोविंद’ अपने चिर परिचित अंदाज में उमाकांत को आवाज देने लगा। उमाकांत भी मानो बस उसी की टेर का इंतजार कर रहे थे। दोनों के बीच बिना बोले ही पता नहीं कितनी बातें हो गईं। देखते ही देखते नौ दिन बीत गए और अब उमाकांत को दूसरे दिन अहले सुबह दिल्ली रवाना होना था। उमाकांत उस शाम काफी देर तक ‘गोविंद’ के पास ही बैठे रहे और ‘गोविंद’ इन सब बातों से बेखबर उमाकांत को सामने देखकर खुश हुआ जा रहा था। दूसरे दिन सुबह जैसे ही घड़ी ने साढ़े छह बजाए उमाकांत को लेने टैक्सी आ गई। उमाकांत और पद्मा को अब निकलना था। निकलने से पहले ‘गोविंद’ से मिलने जब उमाकांत आए, तब ‘गोविंद’ को लगने लगा था कि सबकुछ सामान्य नहीं है। उमाकांत दिल्ली रवाना हो गए और इधर सूने घर में ‘गोविंद’ एक बार फिर अकेला था। अरविंद शाम में ‘गोविंद’ को खाना देने के लिए आया, लेकिन ‘गोविंद’ ने इस बार गुस्से से खाने को देखा तक नहीं। शायद ‘गोविंद’ को लग रहा था कि उसके मालिक उमाकांत अब तो ठीक हो चुके थे, तो उसे छोड़कर फिर क्यों गए। दूसरे दिन सुबह उमाकांत दिल्ली पहुंचे और सबसे पहले पारस से चार दिन बाद की वापसी के टिकट के लिए कहा। पारस शायद इस बार तय कर चुका था कि वो मां और पिता जी को जाने नहीं देगा। वो अपने मां-बाप के साथ रहना चाहता था और उसकी नौकरी इसकी इजाजत नहीं देती थी कि वो गांव में जाकर रह सके। एक ही उपाय था कि उसके मां-बाप ही उसके पास रहें। लेकिन पारस की इस सोच की सबसे बड़ी बाधा और कोई नहीं बल्कि ‘गोविंद’ था, क्योंकि उसके पिता उमाकांत ‘गोविंद’ को छोड़कर रहने को तैयार नहीं थे और दिल्ली के इस फ्लैट में ‘गोविंद’ को लाना संभव नहीं था। पारस की आंखों में अब ‘गोविंद’ खटकने लगा था। पारस ने सबसे पहले अपनी मां पद्मा से इस बात का जिक्र किया। पद्मा को भी कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। तभी पारस ने पद्मा से कहा कि क्यों न ‘गोविंद’ को किसी और को दे दें। यह सुनकर पद्मा भी भावुक हो उठी और इसके लिए साफ इनकार कर दिया। लेकिन फिर बेटे की मजबूरी और ममता के आगे बेबस होकर हामी भर दी। दोनों ने तय किया कि इस बात की खबर उमाकांत को नहीं होने देंगे और किसी तरह से उमाकांत को पंद्रह-बीस दिनों तक घर नहीं जाने देंगे। पारस ने गांव में ‘गोविंद’ की देखभाल कर रहे अरविंद को फोन लगाया और ‘गोविंद’ को किसी और को बेच देने को कह दिया, साथ में यह हिदायत भी दे दी कि वे इस बात का जिक्र फिलहाल उसके पिता उमाकांत से न करें। उमाकांत दिन में दो बार अरविंद को फोन करके ‘गोविंद’ का हाल चाल जाना करते थे। ‘गोविंद’ पिछली बार की तुलना में इस बार थोड़ा सामान्य था और कम से कम खाना खा रहा था। उधर उमाकांत पर पद्मा व पारस थोड़े दिन रुकने का दबाव बना रहे थे। पोते-पोती के साथ वैसे तो उमाकांत को मजा आ रहा था, लेकिन रह रहकर ‘गोविंद’ की चिंता सताती थी। हालांकि ‘गोविंद’ की बेहतर स्थिति की जानकारी होने के बाद इस बार उमाकांत ने भी पत्नी और बच्चों की बात मानने का मन बना लिया। उधर, गांव में अरविंद ‘गोविंद’ के लिए रोज नए ग्राहक ढूंढ कर ला रहा था। ‘गोविंद’ को तो गांव में ही कोई और व्यक्ति ले लेता, लेकिन अरविंद को पारस ने साफ कहा था कि उसे कहीं दूर बेचना है ताकि उमाकांत उसे फिर ढूंढ न पाएं। वैसे भी गांव में उसकी कोई क्या कीमत लगाता, सबको पता था कि ‘गोविंद’ उमाकांत के लिए अनमोल है। गांववालों को अरविंद ने जानबूझकर बताया भी नहीं था। किसी को पता चलता तो सीधे उमाकांत को खबर कर देता या कम से कम पूछने के लिए फोन तो करता ही। इधर, काफी दिन बीत जाने के बाद भी उमाकांत और पद्मा को अपने पास न पाकर ‘गोविंद’ फिर से उदास रहने लगा था और उसने खाना पीना कम कर दिया था। अरविंद को लगा कि अगर ‘गोविंद’ ने दो-चार दिन तक खाना छोड़ दिया तो फिर अच्छे दाम नहीं मिलेंगे। अरविंद ने अगली सुबह शनिवार को ‘गोविंद’ को शहर के हाट में ले जाने का फैसला किया। दूसरे दिन बड़ी मुश्किल से अरविंद ‘गोविंद’ को शहर के हाट में लेकर पहुंचा। वहां मौजूद किसान ‘गोविंद’ के लिए करीब 7000 रुपये का भाव बता रहे थे, सौदा पक्का भी होने वाला था कि तभी एक गोरा चिट्टा जवान वहां आया और अरविंद के हाथ में 11000 रुपये थमाकर ‘गोविंद’ की रस्सी अपने हाथों में थाम ली। ‘गोविंद’ भले ही बैल था, लेकिन उसने अभी तक कभी भी उमाकांत के अलावा किसी की नहीं सुनी थी। ‘गोविंद’ ने अपना शरीर दूसरी दिशा में खींचना शुरू किया, लेकिन तभी उस जवान के साथ मौजूद दो लोगों ने ‘गोविंद’ के शरीर में एक इंजेक्शन दिया और ‘गोविंद’ थोड़ी ही देर में बेहोश हो गया। ‘गोविंद’ को एक ट्रक में लादकर वे लोग कोलकाता की ओर जाने वाले हाइवे पर चल दिए। उस ट्रक पर पहले से भी कुछ जानवर लदे हुए थे। जब ‘गोविंद’ को होश आया उसने खुद को अपने जैसे कुछ गायों व बैलों के बीच में पाया। उस ट्रक पर खड़े होने की भी जगह नहीं थी और ट्रक का पिछला हिस्सा पूरी तरह से कपड़े से ढंका हुआ था। ट्रक असहाय खड़े ‘गोविंद’ व कुछ अन्य जानवरों को लिए कोलकाता की तरफ बढ़ता चला जा रहा था। शाम में उमाकांत ने अरविंद को फोन किया और रोज की तरह ‘गोविंद’ के बारे में पूछा तो अरविंद ने बात टाल दी। पता नहीं क्यों पर उस रात उमाकांत को नींद नहीं आई। उमाकांत ने दिल्ली में कुछ दिन और रहने की योजना रद्द कर दी और दूसरे दिन की ट्रेन में तत्काल टिकट देखने के लिए पारस को कहा। उमाकांत की बेचैनी और उनके दृढ़ निश्चय भरी आवाज के सामने पारस और पद्मा की एक नहीं चली। पारस और पद्मा अब घबरा गए थे। उन्होंने तो उमाकांत के प्यारे ‘गोविंद’ को बिकवा दिया था। पद्मा का हृदय तो अपराध बोध की वजह से बैठा जा रहा था। दूसरे दिन की गाड़ी का टिकट हो चुका था। पारस नहीं जा रहा था। उमाकांत और पद्मा जा रहे थे। उमाकांत गाड़ी में बैठ चुके थे, गाड़ी चली जा रही थी, लेकिन उमाकांत का मन तो बस अपने ‘गोविंद’ को लेकर चिंतित हुआ जा रहा था। ‘गोविंद’ कोई इनसान होता तो शायद मोबाइल फोन के जरिए उससे उमाकांत बात कर पाते। पर वो तो बेजुबान था। यह अलग बात है कि उमाकांत और ‘गोविंद’ एक दूसरे की आंखों को देखकर पता नहीं बिना कहे ही क्या क्या बातें कर लेते थे। उमाकांत ट्रेन पर ही थे कि उनके गांव के ही बचपन के मित्र सरयू का फोन आ गया। सरयू ने शिकायती अंदाज में उमाकांत से पूछा कि अगर ‘गोविंद’ को बेचना ही था तो उन्हें क्यों नहीं बेचा या पूछा क्यों नहीं। उमाकांत के कानों में मानो किसी ने शीशा पिघलाकर डाल दिया था। उमाकांत को जो भी गाली आती थी, उन्होंने सरयू को दे डाली। उमाकांत को लगा कि सरयू उनसे मजाक कर रहा है। बगल में बैठी पद्मा का दिल समय बीतने के साथ और बैठा जा रहा था। उमाकांत के सामने अगर आज खुद महादेव प्रकट हो जाते तो वो सिर्फ एक ही चीज मांगते कि उन्हें उनके ‘गोविंद’ के पास जल्दी पहुंचा दें। खैर, कोहरे की वजह से ट्रेन सात घंटे लेट हो चुकी थी। जो ट्रेन रात के दस बजे उनके शहर पहुंचती वो अब सुबह के पांच बजे पहुंची थी। यहां से गांव जाने में भी दो घंटे लग जाते थे। करीब 7.15 बजे सुबह जब उमाकांत अपने घर पहुंचे तो उनके घर के आगे बने प्लेटफॉर्म नुमा ढांचे पर बैठकर गांव के कुछ लोग हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे और किसी गंभीर चिंतन में व्यस्त थे। उमाकांत को यह सब कुछ नहीं दिख रहा था। वे तो बस एक बार अपने ‘गोविंद’ को देखना चाहते थे और उसे अपने हाथों से खिलाना चाह रहे थे। उमाकांत ने घर की बाहर की तरफ बने गुहाल (गोशाला) का दरवाजा खोला तो ‘गोविंद’ वहां नहीं था। अब उमाकांत के कानों में सरयू की कही बात गूंजने लगी थी। लग रहा था मानो उसके दोनों कानों पर कोई हथौड़ा चला रहा हो और सिर किसी लट्टू की भांति तेजी से घूम रहा हो। अचानक उसके कंधों पर किसी ने हाथ रखा। यह और कोई नहीं बल्कि उमाकांत के बचपन का दोस्त सरयू था। सरयू ने उमकांत को सारी बात बताई। उमाकांत रोते रोते अरविंद के घर पहुंचे। अरविंद ने उन्हें सारी बात बताई। उमाकांत को अपनी पत्नी और बेटे पर बहुत तेज गुस्सा आ रहा था, लेकिन इस वक्त उन्हें सबसे पहले ‘गोविंद’ का पता लगाना था। उमाकांत मवेशियों की खरीद बिक्री करने वाले एक व्यक्ति के पास पहुंचे तो पता चला कि शनिवार को कोलकाता से कुछ व्यापारी आए थे और एक ट्रक में भरकर जानवर कोलकाता लेकर गए थे, शायद ‘गोविंद’ भी उसी में था। यह सुनकर उमाकांत का दिल बैठा जा रहा था। आम तौर पर छोटी जगहों से पशुओं को खरीदकर इस तरह से ट्रक में भरकर बड़े शहर ले जाने का काम कसाई ही करते हैं। यह बात जैसे ही उमाकांत के मन में आई, उमाकांत बेहोश होकर गिर पड़े। उधर, गांव में पद्मा और दिल्ली में पारस अपराध बोध से भरे हुए थे। पारस आज दफ्तर भी नहीं गया था। उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा था। पारस को भी अंदाजा हो चुका था कि ‘गोविंद’ किसी कसाई के हाथ पड़ चुका है। पारस ने कोलकाता में रहने वाले अपने एक आईपीएस मित्र सुधीर को फोन लगाया। सुधीर ने करीब आधे घंटे बाद पारस को बताया कि उसी दिन सुबह झारखंड से कोलकाता आ रहा एक ऐसा ही ट्रक पुरुलिया के पास जब्त हुआ है, जिस पर जानवर लदे हुए हैं। जो पारस गोविंद से नफरत करता था, वही पारस उसी वक्त, बिना समय गंवाए, दिल्ली एयरपोर्ट के लिए निकल पड़ा। उसे अगले तीन चार घंटे में कोलकाता पहुंचना था। वहां से वो अपने आईपीएस मित्र के साथ पुरुलिया जाने वाला था। जिस ‘गोविंद’ से वो नफरत करता था आज अपने पिता की खातिर उसी गोविंद को ढूंढने के लिए वो इतनी मेहनत कर रहा था। उधर, गांव में उमाकांत को होश तो आ गया था, लेकिन निराश उमाकांत ने अन्न जल का त्याग कर दिया। मानो उनकी आत्मा जल्द से जल्द शरीर के बंधन से मुक्त हो जाना चाहती थी और गोविंद के पास पहुंचना चाहती थी। पद्मा के सारे प्रयास विफल हो चुके थे। उमाकांत गुहाल में एक चारपाई पर वहीं पर लेटे हुए थे, जहां ‘गोविंद’ रहता था। उमाकांत को ‘गोविंद’ के बारे में सिर्फ बुरे ख्याल आ रहे थे और उनकी आत्मा विचलित होती जा रही थी। ‘गोविंद’ इंसान नहीं था तो क्या हुआ। उसे उन्होंने अपने बच्चे की तरह से पाला था। उधर, सुधीर के साथ पारस पुरुलिया पहुंच चुका था। थाने में खड़े ट्रक की ओर जैसे जैसे पारस के कदम बढ़ रहे थे, पारस की सांसें तेज होती जा रही थीं। पारस ने पता नहीं इतनी देर में कहां कहां और क्या क्या मन्नतें मांग ली थीं। उसने अपने किसान पिता को पहचानने में भूल की थी। एक किसान के लिए गाय और बैल जानवर नहीं बल्कि उसके घर के सदस्य की तरह होते हैं। पारस अपने आईपीएस मित्र सुधीर के साथ थाने में आया था, लिहाजा उसे थाने में ठीक से बिठाया गया और उस ट्रक की ओर ले जाया गया, जिस पर जानवर लदे हुए थे। पारस की अंदर झांकने की हिम्मत नहीं हुई, उसने भगवान का नाम लेकर बस एक बार पुकारा ‘गोविंद’…..ट्रक के अंदर से जो आवाज आई, उसने पारस की आंखों में चमक भर दी। यह आवाज किसी और की नहीं बल्कि ‘गोविंद’ की थी। पारस ने ‘गोविंद’ को छूने की खूब कोशिश की, लेकिन शायद ‘गोविंद’ को पारस की नहीं बल्कि उमाकांत की जरूरत थी। ट्रक अब वापस उमाकांत के गांव की ओर दौड़ा चला जा रहा था। उसी ट्रक में पारस भी बैठा हुआ था। उमाकांत को अब तक खबर मिल चुकी थी, लेकिन उमाकांत को किसी के कहे पर भरोसा नहीं था, पद्मा के कहे पर भी नहीं, जिसने पूरे जीवन उमाकांत का साथ दिया था, लेकिन शायद यह नहीं समझ पाई थीं कि ‘गोविंद’ उमाकांत के लिए एक जानवर नहीं बल्कि बेटे जैसा है। शाम के करीब 5 बजे जैसे ही चारपाई पर पड़े उमाकांत के कानों में ट्रक की आवाज आई, उमाकांत मानो बिजली की सी तेजी से दरवाजे की ओर लपके। दरवाजे पर ट्रक खड़ा था। उमाकांत ने बड़े प्यार से आवाज लगाई ‘गोविंद’….बेटा….गोविंद…। ट्रक के अंदर से गोविंद ने चिर परिचित अंदाज में अपनी आवाज में उमाकांत को जवाब दिया। जैसे ही ट्रक के पिछले हिस्से में मौजूद बैरियरनुमा सरिया हटाया गया, दूसरे जानवरों को लगभग लांघते हुए ‘गोविंद’ उमाकांत की ओर दौड़ पड़ा। यह मिलन सारे गांववालों के लिए अद्वितीय था। आज जानवर और इंसान का भेद लोगों ने मिटते हुए देखा था। उमाकांत ‘गोविंद’ को चूमते जा रहे थे और ‘गोविंद’ अपनी जीभ से उमाकांत को लगभग भिगा चुका था। पद्मा भी बाहर आ चुकी थी। उसके एक हाथ में पानी से भरा ग्लास था, तो दूसरे में पानी से भरी एक बाल्टी। पद्मा ने पानी का ग्लास उमाकांत की ओर बढ़ाया तो बाल्टी ‘गोविंद’ की ओर। दोनों भूखे प्यासे थे सो देखते ही देखते पूरा पानी पी गए। पारस की आंखों के आंसू रुकने के नाम नहीं ले रहे थे। ये खुशी के आंसू थे। पारस ने तय कर लिया था कि वो अब साल में एक बार नहीं, बल्कि महीने में एक बार अपने गांव अवश्य आएगा। साथ ही ट्रक में मौजूद दूसरे जानवरों के लिए उसने एक गोशाला बनाने का भी निश्चय कर लिया था। एक बेजुबान ‘गोविंद’ ने आईआईटीयन पारस को प्यार की भाषा सिखा दी थी। ‘गोविंद’ ने पारस को यह बता दिया था कि जानवर और इंसान के बीच कोई फर्क नहीं होता। ईश्वर ने भले ही उसे बोलने की शक्ति नहीं दी थी, लेकिन बिना बोले ही उसने इंसान को इंसान होने का मतलब बताया था। दूसरे दिन की सुबह कुछ खास थी।

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